नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे दुर्घटनाओं में मुआवजा देने के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी मृतक यात्री के पास ट्रेन का टिकट बरामद न होने मात्र से उसके परिजनों को मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि रेलवे दुर्घटना के मामलों में केवल टिकट न मिलने को आधार बनाकर पीड़ित परिवार का दावा खारिज करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह तय किया जाना चाहिए कि मृतक वास्तव में एक वैध यात्री था या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन हजारों मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनमें रेल दुर्घटनाओं के बाद मृतक या घायल यात्री के पास टिकट न मिलने के आधार पर रेलवे प्रशासन मुआवजा देने से इंकार करता रहा है। अदालत ने कहा कि दुर्घटना के दौरान टिकट खो जाना, नष्ट हो जाना या अन्य कारणों से बरामद न होना असामान्य बात नहीं है। इसलिए केवल टिकट की अनुपस्थिति को मुआवजा अस्वीकार करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि रेलवे दुर्घटनाएं अक्सर ऐसी परिस्थितियों में होती हैं, जहां यात्रियों का सामान, दस्तावेज और टिकट बिखर जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं। कई मामलों में दुर्घटना के बाद बचाव कार्य के दौरान टिकट मिलना संभव नहीं होता। ऐसे में यदि अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, यात्रा से संबंधित तथ्य या अन्य प्रमाण यह संकेत देते हैं कि मृतक वैध यात्री था, तो उसके परिजनों के मुआवजे के अधिकार को केवल टिकट न मिलने के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि रेलवे दावा अधिकरण (Railway Claims Tribunal) और अन्य संबंधित प्राधिकरणों को ऐसे मामलों में मानवीय और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि मुआवजा व्यवस्था का उद्देश्य दुर्घटना से प्रभावित परिवारों को राहत प्रदान करना है, न कि तकनीकी आधारों पर उनके वैध दावों को अस्वीकार करना।
रेलवे अधिनियम के प्रावधानों के तहत यदि कोई व्यक्ति रेलवे की “अनुचित घटना” (Untoward Incident) का शिकार होता है, तो निर्धारित परिस्थितियों में उसके परिजनों या स्वयं पीड़ित को मुआवजा देने का प्रावधान है। ऐसे मामलों में यह देखा जाता है कि संबंधित व्यक्ति वैध यात्री था और दुर्घटना कानून में निर्धारित श्रेणी के अंतर्गत आती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टिकट न मिलने का अर्थ स्वतः यह नहीं है कि व्यक्ति बिना टिकट यात्रा कर रहा था।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से रेलवे दुर्घटनाओं से जुड़े मुआवजा मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण और अधिक संवेदनशील होगा। अब रेलवे और दावा अधिकरणों को प्रत्येक मामले की परिस्थितियों, उपलब्ध दस्तावेजों, प्रत्यक्ष एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्यों तथा अन्य तथ्यों का समग्र मूल्यांकन करना होगा। केवल टिकट की अनुपलब्धता के आधार पर दावा खारिज करने की प्रवृत्ति पर भी इस निर्णय का प्रभाव पड़ने की संभावना है।
देश में प्रतिवर्ष अनेक रेल दुर्घटनाएं और ट्रेन से गिरने जैसी घटनाएं सामने आती हैं। कई बार हादसे के दौरान मृतक का टिकट नष्ट हो जाता है या घटनास्थल पर नहीं मिल पाता। ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों को मुआवजा प्राप्त करने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय ऐसे परिवारों के लिए राहत देने वाला माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, दुर्घटना के बाद रेलवे पुलिस की जांच रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, सहयात्रियों की गवाही तथा अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य यह स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं कि मृतक वास्तव में संबंधित ट्रेन से यात्रा कर रहा था। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे सभी साक्ष्यों को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय के माध्यम से यह संदेश भी दिया कि न्याय का उद्देश्य केवल तकनीकी नियमों का पालन कराना नहीं, बल्कि वास्तविक पीड़ितों को राहत उपलब्ध कराना भी है। यदि परिस्थितियां स्पष्ट रूप से यह दर्शाती हैं कि व्यक्ति रेलवे दुर्घटना का शिकार हुआ और उसके वैध यात्री होने की पर्याप्त संभावना है, तो मुआवजे का दावा निष्पक्ष और उदार दृष्टिकोण से विचारणीय होना चाहिए।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में रेलवे दुर्घटना से जुड़े मुकदमों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर के रूप में देखा जाएगा। इससे रेलवे दावा अधिकरणों और निचली अदालतों को भी ऐसे मामलों के निस्तारण में मार्गदर्शन मिलेगा तथा पीड़ित परिवारों को न्याय प्राप्त करने में सहूलियत होगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि रेलवे दुर्घटनाओं में मुआवजा तय करते समय केवल टिकट की अनुपस्थिति निर्णायक आधार नहीं हो सकती। प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा, ताकि वास्तविक पीड़ितों और उनके परिजनों को न्याय से वंचित न होना पड़े।
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