नई दिल्ली। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में दिव्यांग अभ्यर्थियों की सहायता के लिए नियुक्त किए जाने वाले ‘स्क्राइब’ (Scribe) की पात्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गया है। कोचिंग संस्थानों के शिक्षकों तथा पहले यूपीएससी की परीक्षा दे चुके अभ्यर्थियों को स्क्राइब बनने से रोकने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से जवाब तलब किया है। अदालत ने इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को निर्धारित की गई है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और यूपीएससी को नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि वर्तमान नियमों और स्क्राइब की नियुक्ति प्रक्रिया में क्या पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, ताकि परीक्षा की निष्पक्षता और पारदर्शिता पूरी तरह सुनिश्चित की जा सके। अदालत का यह कदम ऐसे समय आया है जब प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को लेकर लगातार चर्चा हो रही है।
याचिका में मुख्य रूप से यह मांग की गई है कि ऐसे व्यक्तियों को स्क्राइब बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, जो स्वयं पहले यूपीएससी की परीक्षा दे चुके हों या जो सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों में शिक्षक के रूप में कार्यरत हों। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐसे लोगों को परीक्षा के स्वरूप, प्रश्नों और उत्तर लेखन की रणनीति का विशेष ज्ञान होता है, जिससे निष्पक्ष परीक्षा की भावना प्रभावित हो सकती है। इसलिए स्क्राइब की नियुक्ति के लिए अधिक स्पष्ट और कड़े पात्रता मानदंड निर्धारित किए जाने की आवश्यकता है।
क्या होता है स्क्राइब?
स्क्राइब वह व्यक्ति होता है जो उन दिव्यांग अभ्यर्थियों की ओर से उत्तर पुस्तिका लिखता है, जो शारीरिक या अन्य स्वीकृत दिव्यांगता के कारण स्वयं लिखने में सक्षम नहीं होते। स्क्राइब का कार्य केवल परीक्षार्थी द्वारा बताए गए उत्तरों को शब्दशः लिखना होता है। उसे किसी भी प्रकार की शैक्षणिक सहायता, सुझाव या उत्तर देने का अधिकार नहीं होता।
यूपीएससी सहित देश की कई प्रमुख परीक्षाओं में दिव्यांग उम्मीदवारों को समान अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्क्राइब की सुविधा प्रदान की जाती है। यह व्यवस्था दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 तथा केंद्र सरकार के संबंधित दिशा-निर्देशों के अनुरूप लागू की गई है।
याचिका में क्या उठाए गए हैं सवाल?
याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि स्क्राइब स्वयं सिविल सेवा परीक्षा का अनुभवी अभ्यर्थी हो या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाला शिक्षक हो, तो उसके पास परीक्षा संबंधी विशेष जानकारी और अनुभव होता है। ऐसी स्थिति में निष्पक्षता को लेकर संदेह उत्पन्न हो सकता है, भले ही किसी नियम का प्रत्यक्ष उल्लंघन न हुआ हो।
याचिका में यह भी कहा गया है कि परीक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए स्क्राइब चयन प्रक्रिया में ऐसे मानदंड तय किए जाने चाहिए, जिससे किसी भी प्रकार के हितों के टकराव (Conflict of Interest) की संभावना समाप्त हो सके। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि स्क्राइब केवल लिखने तक सीमित रहे और परीक्षा प्रक्रिया पर उसका कोई अनुचित प्रभाव न पड़े।
अदालत ने मांगा सरकार और यूपीएससी का पक्ष
दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और यूपीएससी को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने फिलहाल किसी प्रकार का अंतरिम आदेश पारित नहीं किया है, बल्कि पहले संबंधित पक्षों का पक्ष जानने का निर्णय लिया है।
अब केंद्र सरकार और यूपीएससी को अदालत के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि वर्तमान नियमों में स्क्राइब की नियुक्ति के लिए कौन-कौन से पात्रता मानदंड लागू हैं, क्या सुरक्षा उपाय अपनाए जाते हैं तथा क्या मौजूदा व्यवस्था परीक्षा की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है।
निष्पक्ष परीक्षा और दिव्यांग अधिकारों के बीच संतुलन
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला दो महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करने से जुड़ा है। एक ओर दिव्यांग अभ्यर्थियों को समान अवसर और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना संविधान तथा कानून के तहत राज्य की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्क्राइब से जुड़े नियमों में किसी प्रकार की अस्पष्टता है तो उसे दूर किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा करते समय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वास्तविक जरूरतमंद दिव्यांग अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित न हों।
वर्तमान व्यवस्था क्या कहती है?
यूपीएससी और अन्य परीक्षा एजेंसियां स्क्राइब की नियुक्ति के लिए पहले से निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करती हैं। सामान्यतः स्क्राइब की शैक्षणिक योग्यता, पात्रता और परीक्षा से संबंधित अन्य शर्तें निर्धारित होती हैं। कई मामलों में अभ्यर्थी स्वयं भी स्क्राइब का चयन कर सकते हैं, जबकि कुछ परिस्थितियों में परीक्षा प्राधिकरण स्क्राइब उपलब्ध कराता है।
हालांकि याचिका में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या वर्तमान नियम इस बात को पर्याप्त रूप से नियंत्रित करते हैं कि स्क्राइब स्वयं प्रतियोगी परीक्षा विशेषज्ञ, कोचिंग शिक्षक या पूर्व यूपीएससी अभ्यर्थी न हो।
दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है
यदि दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करता है या सरकार एवं यूपीएससी को नियमों में संशोधन करने का निर्देश देता है, तो इसका प्रभाव केवल सिविल सेवा परीक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। भविष्य में अन्य राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में भी स्क्राइब चयन संबंधी नीतियों की समीक्षा की जा सकती है।
शिक्षा और परीक्षा प्रणाली से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का अंतिम निर्णय दिव्यांग अभ्यर्थियों के अधिकारों, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और पारदर्शिता—तीनों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
16 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूपीएससी से जवाब मांगते हुए मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को निर्धारित की है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और आयोग अदालत के समक्ष क्या पक्ष रखते हैं तथा क्या मौजूदा नियमों को पर्याप्त बताते हैं या फिर उनमें किसी प्रकार के संशोधन की आवश्यकता स्वीकार करते हैं।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, निष्पक्षता और समान अवसर को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। ऐसे में दिल्ली हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय न केवल यूपीएससी की स्क्राइब व्यवस्था, बल्कि भविष्य की परीक्षा नीतियों और दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए उपलब्ध सुविधाओं की रूपरेखा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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