नई दिल्ली। दक्षिण चीन सागर (South China Sea) को लेकर भारत की स्पष्ट, संतुलित और अंतरराष्ट्रीय कानून आधारित नीति एक बार फिर वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गई है। समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि (UNCLOS) के तहत दिए गए ऐतिहासिक मध्यस्थता फैसले की दसवीं वर्षगांठ पर भारत ने अपने पुराने और स्पष्ट रुख को दोहराते हुए कहा कि समुद्री विवादों का समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून और स्थापित नियमों के अनुसार ही होना चाहिए। भारत के इस बयान पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है।
भारत ने अपने आधिकारिक रुख में स्पष्ट किया कि वह समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि (UNCLOS) को वैश्विक समुद्री व्यवस्था की आधारशिला मानता है और सभी देशों से अपेक्षा करता है कि वे अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करें। भारत ने यह भी दोहराया कि समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, निर्बाध व्यापार, नौवहन की सुरक्षा तथा विवादों का शांतिपूर्ण समाधान वैश्विक स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
भारत का यह बयान ऐसे समय आया है जब दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां, कृत्रिम द्वीपों का निर्माण और क्षेत्रीय दावों को लेकर तनाव लगातार बना हुआ है। चीन लगभग पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा करता है, जबकि फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी इस समुद्री क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों पर अपना अधिकार जताते हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र वर्षों से एशिया की सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक चुनौतियों में शामिल रहा है।
दस वर्ष पहले आया था ऐतिहासिक फैसला
वर्ष 2016 में हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Permanent Court of Arbitration) ने फिलीपींस द्वारा दायर मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा था कि दक्षिण चीन सागर पर चीन के तथाकथित “नाइन-डैश लाइन” (Nine-Dash Line) आधारित व्यापक दावों का अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई वैध आधार नहीं है। न्यायाधिकरण ने यह भी माना कि समुद्री क्षेत्रों पर अधिकार का निर्धारण यूएनक्लोस के प्रावधानों के अनुसार होना चाहिए।
हालांकि चीन ने उस फैसले को शुरू से ही अस्वीकार कर दिया और कहा कि वह इस निर्णय को न तो मानता है और न ही इसे लागू करेगा। इसके बावजूद अधिकांश लोकतांत्रिक देशों और समुद्री कानून के समर्थकों ने इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय कानून की महत्वपूर्ण जीत माना।
भारत ने दोहराया कानून आधारित दृष्टिकोण
दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत ने फिर स्पष्ट किया कि वह यूएनक्लोस के सिद्धांतों के अनुरूप नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (Rules-Based International Order) का समर्थन करता है। भारत ने कहा कि सभी देशों को समुद्री कानून का सम्मान करना चाहिए और विवादों का समाधान बातचीत, कूटनीति तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्थाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए।
भारत का यह रुख नया नहीं है। पिछले कई वर्षों से नई दिल्ली लगातार यह कहती रही है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में शांति, स्थिरता और स्वतंत्र नौवहन वैश्विक आर्थिक सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। भारत का मानना है कि किसी भी देश को बल प्रयोग या दबाव की राजनीति के माध्यम से समुद्री क्षेत्रों पर एकतरफा नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
चीन ने जताई नाराजगी
भारत के बयान के बाद चीन ने अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि दक्षिण चीन सागर का मामला संबंधित देशों के बीच का विषय है और बाहरी देशों को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। चीन ने एक बार फिर 2016 के मध्यस्थता फैसले को “अवैध और अमान्य” बताया तथा अपने क्षेत्रीय दावों को दोहराया।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत द्वारा यूएनक्लोस और अंतरराष्ट्रीय कानून के समर्थन की पुनः पुष्टि चीन को इसलिए भी असहज कर रही है क्योंकि इससे वैश्विक मंच पर चीन की स्थिति पर सवाल उठते हैं। भारत भले ही किसी पक्ष विशेष का नाम लेकर बयान नहीं देता, लेकिन उसका जोर हमेशा नियम-आधारित व्यवस्था पर रहता है, जिसे चीन अपने दावों के संदर्भ में चुनौती के रूप में देखता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है दक्षिण चीन सागर?
दक्षिण चीन सागर भले ही भारत की भौगोलिक सीमा से दूर स्थित हो, लेकिन यह क्षेत्र भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों से गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत का एक बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) की सुरक्षा के लिए यह समुद्री मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” और हिंद-प्रशांत रणनीति भी इस क्षेत्र में स्थिरता और मुक्त नौवहन पर आधारित है। इसलिए भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि समुद्री मार्ग सभी देशों के लिए खुले और सुरक्षित रहने चाहिए तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
इंडो-पैसिफिक में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा
पिछले कुछ वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बन गया है। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देशों ने मुक्त, समावेशी और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक की वकालत की है। दूसरी ओर चीन इस क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है।
क्वाड (Quad) जैसे बहुपक्षीय मंचों में भी समुद्री सुरक्षा, स्वतंत्र नौवहन और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सम्मान पर लगातार जोर दिया जाता रहा है। भारत इन सभी मंचों पर यह स्पष्ट करता रहा है कि उसका उद्देश्य किसी देश का विरोध करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था को मजबूत करना है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर
विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण चीन सागर का विवाद केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक महत्व का मुद्दा है। विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो उसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य देशों ने समय-समय पर यूएनक्लोस के सम्मान और समुद्री विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता पर बल दिया है। भारत का हालिया बयान भी इसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप माना जा रहा है।
भारत की संतुलित लेकिन स्पष्ट कूटनीति
विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि भारत ने इस पूरे मुद्दे पर संतुलित लेकिन सिद्धांत आधारित रुख अपनाया है। भारत किसी देश के खिलाफ प्रत्यक्ष बयानबाजी से बचते हुए अंतरराष्ट्रीय कानून, स्वतंत्र नौवहन और शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करता है। यही कारण है कि नई दिल्ली की विदेश नीति को जिम्मेदार और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के समर्थन के रूप में देखा जाता है।
दक्षिण चीन सागर को लेकर भारत का ताजा रुख यह संकेत देता है कि नई दिल्ली अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों से जुड़े मुद्दों पर अब पहले की तुलना में अधिक स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रख रही है। चीन की नाराजगी के बावजूद भारत ने यह संदेश दिया है कि अंतरराष्ट्रीय कानून, यूएनक्लोस के सिद्धांत और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता उसके लिए केवल कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विदेश नीति के मूल आधार हैं। आने वाले समय में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भारत की यह नीति वैश्विक मंच पर उसकी भूमिका को और अधिक महत्वपूर्ण बना सकती है।
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