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भारतीय रेलवे हरित ऊर्जा के नए दौर में, हरियाणा के जींद से शुरू होगी हाइड्रोजन ट्रेन की नई यात्रा

चंडीगढ़। भारतीय रेलवे अब अपने 170 वर्ष से अधिक लंबे इतिहास में एक और ऐतिहासिक अध्याय जोड़ने की तैयारी में है। भाप के इंजन से शुरू होकर डीजल और फिर विद्युत चालित ट्रेनों तक पहुंचा रेलवे का सफर अब हरित ऊर्जा (ग्रीन एनर्जी) के नए युग में प्रवेश करने जा रहा है। इस परिवर्तनकारी पहल की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण की कर्मभूमि हरियाणा के जींद जिले से होने जा रही है, जिसे इस महत्वाकांक्षी परियोजना का केंद्र बनाया गया है। यदि यह पहल सफल रहती है, तो भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जहां हाइड्रोजन आधारित रेल परिवहन बड़े पैमाने पर विकसित किया जा रहा है।

भारतीय रेलवे की इस नई पहल को केवल तकनीकी बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और आधुनिक परिवहन प्रणाली की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। रेलवे का लक्ष्य आने वाले वर्षों में कार्बन उत्सर्जन को कम करना, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाना और स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन व्यवस्था विकसित करना है। इसी रणनीति के तहत हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली ट्रेनों की शुरुआत की जा रही है।

भाप से हाइड्रोजन तक का ऐतिहासिक सफर

भारतीय रेलवे की शुरुआत वर्ष 1853 में भाप के इंजन से हुई थी। इसके बाद समय के साथ डीजल इंजन आए और फिर बड़े पैमाने पर रेल मार्गों का विद्युतीकरण हुआ। आज भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक है, जहां प्रतिदिन लाखों यात्री और भारी मात्रा में माल ढुलाई होती है।

अब रेलवे एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां केवल तेज गति और आधुनिक सुविधाएं ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी प्राथमिकता बन गई है। इसी सोच के तहत हाइड्रोजन ईंधन आधारित ट्रेनों को भविष्य का विकल्प माना जा रहा है।

क्यों चुना गया जींद?

हरियाणा का जींद जिला भौगोलिक दृष्टि से प्रदेश के मध्य में स्थित है और रेलवे नेटवर्क की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अधिकारियों के अनुसार यहां आवश्यक बुनियादी ढांचे के विकास, परीक्षण और संचालन की दृष्टि से अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध हैं। इसी कारण इसे हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना की शुरुआत के लिए चुना गया है।

जींद से इस परियोजना की शुरुआत होने से हरियाणा देश में हरित रेलवे तकनीक के प्रमुख केंद्रों में शामिल हो सकता है। परियोजना के तहत हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण, ईंधन भरने की व्यवस्था तथा संबंधित तकनीकी ढांचे का विकास भी किया जाएगा।

कैसे काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन?

हाइड्रोजन ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजन की तरह जीवाश्म ईंधन का उपयोग नहीं करती। इसमें फ्यूल सेल तकनीक (Fuel Cell Technology) का प्रयोग किया जाता है। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली उत्पन्न होती है, जिससे ट्रेन संचालित होती है।

इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन लगभग नहीं होता। इसके बजाय केवल जलवाष्प (Water Vapour) और ऊष्मा निकलती है। यही कारण है कि इसे पर्यावरण के अनुकूल परिवहन तकनीक माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार हाइड्रोजन ट्रेनें डीजल इंजनों की तुलना में अधिक स्वच्छ, कम शोर वाली और भविष्य की टिकाऊ परिवहन प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने में परिवहन क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

रेलवे देश के सबसे बड़े सार्वजनिक परिवहन नेटवर्कों में से एक है। यदि डीजल आधारित ट्रेनों की जगह धीरे-धीरे स्वच्छ ऊर्जा आधारित ट्रेनें संचालित होने लगती हैं, तो इससे लाखों टन कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है। साथ ही वायु प्रदूषण और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता भी कम होगी।

आत्मनिर्भर भारत को मिलेगा बल

विशेषज्ञों का मानना है कि हाइड्रोजन आधारित रेलवे परियोजना केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और औद्योगिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इससे देश में हाइड्रोजन उत्पादन, फ्यूल सेल निर्माण, ऊर्जा भंडारण प्रणाली और संबंधित इंजीनियरिंग उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।

सरकार पहले ही राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से भारत को स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में काम कर रही है। रेलवे की यह पहल उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

किन देशों में चल रही हैं हाइड्रोजन ट्रेनें?

दुनिया के कुछ देशों में पहले से हाइड्रोजन ट्रेनों का सफल संचालन हो रहा है। जर्मनी ने इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाई है, जहां कई मार्गों पर हाइड्रोजन ट्रेनें नियमित रूप से चल रही हैं। इसके अलावा फ्रांस, इटली, ऑस्ट्रिया, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया भी इस तकनीक पर तेजी से कार्य कर रहे हैं।

भारत की परियोजना सफल होने पर देश वैश्विक हरित परिवहन तकनीक की दिशा में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकता है।

रेलवे के आधुनिकीकरण को मिलेगी नई गति

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रेलवे ने तेज गति से आधुनिकीकरण की दिशा में कई बड़े कदम उठाए हैं। वंदे भारत एक्सप्रेस, रेल मार्गों का व्यापक विद्युतीकरण, आधुनिक स्टेशन पुनर्विकास, कवच सुरक्षा प्रणाली, समर्पित माल गलियारे (Dedicated Freight Corridors) और डिजिटल तकनीकों का विस्तार इसी परिवर्तन का हिस्सा हैं।

हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना इस श्रृंखला की अगली महत्वपूर्ण कड़ी मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में जिन रेल मार्गों का पूर्ण विद्युतीकरण आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं होगा, वहां हाइड्रोजन आधारित ट्रेनें प्रभावी विकल्प बन सकती हैं।

रोजगार और स्थानीय विकास को मिलेगा बढ़ावा

जींद में इस परियोजना के विकास से स्थानीय स्तर पर भी आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने की संभावना है। हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र, ईंधन भरने के स्टेशन, रखरखाव केंद्र और तकनीकी सेवाओं के विकास से नए रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। साथ ही क्षेत्र में औद्योगिक निवेश बढ़ने की भी संभावना जताई जा रही है।

भविष्य की दिशा तय करेगी यह परियोजना

रेलवे विशेषज्ञों का मानना है कि हाइड्रोजन ट्रेन केवल एक नई तकनीक नहीं, बल्कि भविष्य की परिवहन व्यवस्था का संकेत है। यदि प्रारंभिक चरण सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में देश के अन्य गैर-विद्युतीकृत या कम यातायात वाले रेल मार्गों पर भी ऐसी ट्रेनों का विस्तार किया जा सकता है।

भारतीय रेलवे की यह पहल दर्शाती है कि देश अब केवल परिवहन सुविधाओं के विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी नवाचार को भी समान प्राथमिकता दे रहा है। हरियाणा के जींद से शुरू होने वाला यह सफर भारतीय रेलवे को हरित ऊर्जा आधारित आधुनिक परिवहन प्रणाली की दिशा में एक नई पहचान दिला सकता है और भारत को स्वच्छ, टिकाऊ तथा भविष्य उन्मुख रेल नेटवर्क के निर्माण की ओर मजबूती से आगे बढ़ा सकता है।

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