जयपुर। राजस्थान के सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को झकझोर देने वाली एक गंभीर घटना ने पूरे प्रदेश में चिंता की लहर दौड़ा दी है। पिछले दो महीनों के दौरान राज्य के पांच जिलों के सरकारी अस्पतालों में सिजेरियन (सी-सेक्शन) प्रसव के बाद 20 प्रसूताओं की मौत और 10 अन्य महिलाओं की किडनी खराब होने के मामलों ने स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन और सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इन घटनाओं के सामने आने के बाद जिलों से लेकर राजधानी जयपुर तक हड़कंप मच गया है। स्वास्थ्य विभाग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी है, जबकि विशेषज्ञों की टीमें संबंधित अस्पतालों में पहुंचकर मौतों और गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं के कारणों का पता लगाने में जुट गई हैं।
इन घटनाओं ने सरकारी अस्पतालों में प्रसूति सेवाओं की गुणवत्ता, ऑपरेशन थिएटरों की व्यवस्था, संक्रमण नियंत्रण, दवाओं और चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के पालन पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन परिवारों ने अपने घर की महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की उम्मीद में सरकारी अस्पतालों में भर्ती कराया था, उन्हें अब अपनों को खोने का गहरा सदमा झेलना पड़ रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिन महिलाओं की मृत्यु हुई, उनमें अधिकांश का सिजेरियन ऑपरेशन सरकारी अस्पतालों में किया गया था। ऑपरेशन के बाद कई महिलाओं की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। कुछ मामलों में तेज बुखार, संक्रमण, रक्तचाप में गिरावट, सांस लेने में तकलीफ और कई अंगों के प्रभावित होने जैसे लक्षण सामने आए। स्थिति गंभीर होने पर कई मरीजों को बड़े अस्पतालों में रेफर किया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। वहीं कुछ महिलाओं में किडनी फेल होने जैसी गंभीर जटिलताएं विकसित हुईं, जिसके चलते उन्हें डायलिसिस और विशेष उपचार की आवश्यकता पड़ी।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सभी मामलों की विस्तृत जांच कराई जा रही है। यह पता लगाया जा रहा है कि कहीं ऑपरेशन के दौरान संक्रमण, दवाओं की गुणवत्ता, एनेस्थीसिया, चिकित्सा उपकरणों की स्वच्छता, ऑपरेशन के बाद की देखभाल या किसी अन्य चिकित्सकीय लापरवाही की भूमिका तो नहीं रही। साथ ही ऑपरेशन थिएटरों में अपनाई गई प्रक्रियाओं और संक्रमण नियंत्रण के मानकों की भी समीक्षा की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिजेरियन ऑपरेशन सामान्य चिकित्सा प्रक्रिया है और अधिकांश मामलों में सुरक्षित माना जाता है। हालांकि यदि संक्रमण नियंत्रण में चूक हो जाए, उपकरण पूरी तरह से स्टरलाइज न हों, दवाओं में गुणवत्ता संबंधी समस्या हो या ऑपरेशन के बाद मरीज की निगरानी में कमी रह जाए, तो गंभीर जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे मामलों में सेप्सिस (गंभीर संक्रमण), मल्टी ऑर्गन फेल्योर और किडनी डैमेज जैसी स्थितियां जानलेवा साबित हो सकती हैं।
राज्य सरकार ने मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए स्वास्थ्य विभाग से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। संबंधित जिलों के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (CMHO), अस्पताल अधीक्षकों और चिकित्सा अधिकारियों से भी जवाब मांगा गया है। प्रारंभिक स्तर पर सभी मामलों का मेडिकल ऑडिट कराया जा रहा है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मौतों और किडनी खराब होने के पीछे वास्तविक कारण क्या थे।
सूत्रों के अनुसार, जांच का दायरा केवल मरीजों के इलाज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऑपरेशन थिएटरों में उपयोग किए गए चिकित्सा उपकरण, दवाएं, इंजेक्शन, आईवी फ्लूड, स्टरलाइजेशन प्रक्रिया, संक्रमण नियंत्रण प्रणाली तथा अस्पतालों की कार्यप्रणाली की भी गहन जांच की जाएगी। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
इन घटनाओं के बाद राज्य के अन्य सरकारी अस्पतालों में भी सतर्कता बढ़ा दी गई है। स्वास्थ्य विभाग ने सभी चिकित्सा संस्थानों को संक्रमण नियंत्रण संबंधी मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने, ऑपरेशन थिएटरों की नियमित जांच कराने और प्रसव के बाद मरीजों की निगरानी को और मजबूत बनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही गंभीर मरीजों की पहचान कर समय रहते उच्च चिकित्सा संस्थानों में रेफर करने की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने पिछले कई वर्षों में व्यापक अभियान चलाए हैं, जिसके परिणामस्वरूप सरकारी अस्पतालों में प्रसव कराने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ी है। ऐसे में यदि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में इस प्रकार की घटनाएं सामने आती हैं तो इसका असर आम लोगों के भरोसे पर भी पड़ सकता है। इसलिए आवश्यक है कि जांच पूरी निष्पक्षता और वैज्ञानिक आधार पर हो तथा दोषियों की जिम्मेदारी तय की जाए।
मृतक महिलाओं के परिजनों ने भी कई स्थानों पर अस्पताल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि ऑपरेशन के बाद मरीजों की हालत बिगड़ने के बावजूद समय पर उचित उपचार नहीं मिला और कई मामलों में स्थिति गंभीर होने के बाद ही बड़े अस्पतालों के लिए रेफर किया गया। हालांकि अस्पताल प्रशासन ने कहा है कि सभी मरीजों का उपचार स्थापित चिकित्सा मानकों के अनुसार किया गया और प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग-अलग थीं। इसलिए जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि एक ही अवधि में कई अस्पतालों में इस प्रकार की घटनाएं सामने आई हैं, तो जांच केवल व्यक्तिगत मामलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि कहीं किसी दवा, मेडिकल सप्लाई, संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था या प्रशासनिक स्तर पर कोई समान समस्या तो नहीं रही, जिसने एक से अधिक अस्पतालों को प्रभावित किया हो।
राजस्थान में सामने आए इन मामलों ने पूरे देश का ध्यान मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता की ओर आकर्षित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित मातृत्व केवल सफल ऑपरेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑपरेशन से पहले की जांच, ऑपरेशन के दौरान मानकों का पालन और उसके बाद की निगरानी—इन तीनों चरणों में समान सतर्कता आवश्यक होती है। किसी भी स्तर पर हुई छोटी सी चूक गंभीर परिणाम का कारण बन सकती है।
फिलहाल सभी की निगाहें स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि जांच में चिकित्सकीय लापरवाही, संक्रमण नियंत्रण में कमी, दवाओं की गुणवत्ता में गड़बड़ी या प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चूक सामने आती है तो यह मामला राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ा सबक साबित हो सकता है। वहीं प्रभावित परिवारों को उम्मीद है कि जांच निष्पक्ष होगी, जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होगी और भविष्य में ऐसी दर्दनाक घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।
News Wani
