Breaking News

कालिख की परत से पिघल रहे हिमालयी ग्लेशियर, बढ़ रहा बर्फ पिघलने का खतरा

नई दिल्ली। हिमालय के ग्लेशियर केवल बढ़ते तापमान की वजह से ही संकट में नहीं हैं, बल्कि बर्फ की सतह पर जमा होने वाली कालिख और धूल भी इनके तेजी से पिघलने की बड़ी वजह बन रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, बर्फ पर जमी काली परत सूरज की किरणों को अधिक मात्रा में सोखती है, जिससे ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।

बर्फ सामान्य तौर पर सूर्य की रोशनी का बड़ा हिस्सा परावर्तित कर देती है, लेकिन कालिख और अन्य गहरे रंग के कण इसकी परावर्तन क्षमता को कम कर देते हैं। इसके कारण बर्फ अधिक गर्म होने लगती है और पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है।

हिमालयी क्षेत्र में वाहनों, उद्योगों, जंगलों में लगने वाली आग और अन्य स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषक कण हवा के साथ ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुंचते हैं। ये कण बर्फ पर जमकर ग्लेशियरों की सतह को प्रभावित करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का असर केवल पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे नदियों के जल प्रवाह, कृषि, पेयजल और निचले इलाकों की जल सुरक्षा पर भी दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में हिमालयी ग्लेशियरों को बचाने के लिए तापमान में वृद्धि के साथ-साथ वायु प्रदूषण और बर्फ पर जमने वाली कालिख को कम करना भी जरूरी है।

ग्लेशियरों के पिघलने से कई नदियों के जलस्तर में मौसमी असंतुलन पैदा हो सकता है। गर्मियों के दौरान शुरुआत में नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में ग्लेशियरों के सिकुड़ने से जल प्रवाह कम होने का खतरा है। इसका सीधा असर उन करोड़ों लोगों पर पड़ेगा, जो पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए हिमालयी नदियों पर निर्भर हैं।

बर्फ पर जमा कालिख का असर केवल पिघलने तक सीमित नहीं रहता। इससे ग्लेशियरों की सतह पर दरारें बढ़ सकती हैं और बर्फ की संरचना कमजोर हो सकती है। कई बार पिघला हुआ पानी ग्लेशियरों के भीतर जमा होकर झीलों का रूप ले लेता है। ऐसी झीलों के टूटने से अचानक बाढ़ आने का खतरा बढ़ जाता है, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, इस समस्या से निपटने के लिए प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी है। डीजल वाहनों और कोयले के इस्तेमाल को कम करने, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने, जंगलों की आग पर नियंत्रण रखने और पर्वतीय क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने से कालिख के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।

वैज्ञानिक ग्लेशियरों की सतह, बर्फ की मोटाई और तापमान में हो रहे बदलावों पर लगातार नजर रखने की सलाह दे रहे हैं। उपग्रहों, ड्रोन और जमीनी सर्वेक्षणों की मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि किन क्षेत्रों में कालिख और धूल का प्रभाव सबसे अधिक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियरों को बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर जागरूकता के साथ-साथ क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी है। हिमालय कई देशों के लिए जल स्रोत है, इसलिए इसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी साझा होनी चाहिए। समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में जल संकट, बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं का खतरा और गंभीर हो सकता है।

About NW-Editor

Check Also

‘पत्नी का हर कदम पति के साथ होना जरूरी नहीं’: मद्रास HC ने 16 साल से अलग रह रहे दंपती को दी तलाक की मंजूरी

नई दिल्ली। मद्रास हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *