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हिमालय में 7 मिनट में मची तबाही: झील नहीं, ग्लेशियर टूटा; चीन की तैयारियां भी नहीं रोक पाईं विनाश

नई दिल्ली। चीन-नेपाल सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में 26 अगस्त को आई भीषण प्राकृतिक आपदा ने तबाही की तैयारियों और बढ़ते जलवायु संकट को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महज छह से सात मिनट के भीतर ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आया और बर्फ, चट्टानों तथा पानी का तेज बहाव विनाशकारी लहर में बदल गया। इस आपदा में 1200 से अधिक लोगों के मारे जाने की जानकारी सामने आई है।

हैरानी की बात यह है कि जिस इलाके में यह हादसा हुआ, वहां चीन पहले ही प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए व्यापक तैयारियां कर चुका था। करीब 14 महीने पहले इसी क्षेत्र में ग्लेशियल झील फटने के कारण भूस्खलन और बाढ़ आई थी। उस दौरान कई वाहन, मकान और एक पुल बह गए थे। घटना के बाद चीन ने लगभग छह महीने तक सीमा पोर्ट को बंद रखा और आपदा से बचाव के लिए निगरानी तथा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की थी।

पिछली आपदा के बाद बढ़ाई गई थी निगरानी

ग्लेशियल झील से जुड़े खतरे को देखते हुए पानी के स्तर पर लगातार निगरानी के लिए सेंसर लगाए गए थे। इसके अलावा तटबंध और बाढ़रोधी दीवारें बनाई गईं तथा पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए नहरों का निर्माण किया गया। स्थानीय अधिकारियों और ग्रामीणों को आपदा से निपटने की ट्रेनिंग दी गई और मॉक ड्रिल भी कराई गई।

जुलाई में इन तैयारियों की समीक्षा भी की गई थी। इसके बावजूद 26 अगस्त की घटना ने पूरी व्यवस्था को चुनौती दे दी।

इस बार झील नहीं, सीधे ग्लेशियर ने बदला खतरे का रूप

इस बार तबाही ग्लेशियल झील फटने से नहीं हुई। ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर पहाड़ से नीचे आ गया। इसके साथ बर्फ और भारी चट्टानें तेजी से नीचे की ओर बढ़ीं। रास्ते में पानी और मलबा भी इसमें शामिल होता गया, जिससे कुछ ही समय में यह बेहद शक्तिशाली बाढ़ जैसी लहर में बदल गया।

ग्यिरोंग पोर्ट परिसर तक पहुंचते-पहुंचते इस लहर ने 27 इमारतों को नुकसान पहुंचाया और इसके बाद तबाही नेपाल की तरफ बढ़ गई।

सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि ग्लेशियर के टूटने और उसके मलबे के ग्यिरोंग पोर्ट तक पहुंचने के बीच केवल छह से सात मिनट का अंतर था। इतने कम समय में चेतावनी जारी करना, लोगों को निकालना और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना बेहद मुश्किल था।

ग्यिरोंग पोर्ट की भौगोलिक स्थिति बनी बड़ी चुनौती

यह घटना इस सवाल को भी जन्म देती है कि इतनी संवेदनशील जगह पर बड़ा सीमा व्यापार केंद्र क्यों विकसित किया गया। ग्यिरोंग पोर्ट एक संकरी घाटी में स्थित है, जहां ल्हेंडे खोला और त्रिशूली नदी का क्षेत्र आता है। आसपास के ग्लेशियरों से आने वाला पानी इन नदियों में पहुंचता है।

इसी सीमित समतल क्षेत्र में पुल, कस्टम यार्ड, ड्राई पोर्ट और ट्रकों की पार्किंग जैसी महत्वपूर्ण सुविधाएं मौजूद हैं। ऐसे में पहाड़ों से अचानक पानी, बर्फ या मलबा आने पर सबसे पहले यही क्षेत्र प्रभावित होता है।

इस इलाके में वर्ष 2025 में भी ग्लेशियल झील से निकले पानी के कारण बाढ़ और भूस्खलन हुआ था। अब एक बार फिर इसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक आपदा ने खतरे की गंभीरता को उजागर कर दिया है।

व्यापार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है यह रास्ता

प्राकृतिक जोखिमों के बावजूद ग्यिरोंग पोर्ट चीन और नेपाल के बीच व्यापार के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। पिछले एक दशक में यह दोनों देशों के बीच प्रमुख सीमा व्यापार मार्ग के रूप में विकसित हुआ है। चीन-नेपाल के कुल व्यापार का करीब एक-तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। इसके अलावा हर साल बड़ी संख्या में लोग भी इस रास्ते से दोनों देशों के बीच आवागमन करते हैं।

इससे पहले झांगमू-कोदारी सीमा मार्ग दोनों देशों के बीच प्रमुख संपर्क मार्ग था। वर्ष 2015 के नेपाल भूकंप के बाद यह रास्ता बुरी तरह प्रभावित हुआ और इसके बाद ग्यिरोंग का महत्व बढ़ गया। हालांकि झांगमू क्षेत्र भी भूस्खलन और ग्लेशियल झील से जुड़ी आपदाओं के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

अब एक नहीं, कई खतरों की करनी होगी तैयारी

26 अगस्त की घटना ने यह साफ कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में केवल बाढ़ या ग्लेशियल झीलों की निगरानी पर्याप्त नहीं है। प्राकृतिक आपदाएं अब एक-दूसरे से जुड़कर तेजी से बड़ा खतरा पैदा कर सकती हैं।

पहले ग्लेशियर टूटा, उसके बाद बर्फ और चट्टानें नीचे आईं और फिर पानी व मलबे ने तेज बहाव का रूप ले लिया। विशेषज्ञ ऐसी घटनाओं को ‘कैस्केड ऑफ हैजर्ड्स’ यानी एक के बाद एक जुड़ते प्राकृतिक खतरों की श्रृंखला मानते हैं।

बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और पहाड़ी क्षेत्रों में पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने से भविष्य में ऐसी घटनाएं और जटिल हो सकती हैं। इसलिए हिमालय में आपदा प्रबंधन को केवल बाढ़ या भूस्खलन जैसे किसी एक खतरे तक सीमित रखने के बजाय कई संभावित खतरों को एक साथ ध्यान में रखकर तैयार करना जरूरी हो गया है।

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