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अमेरिका-ईरान संघर्ष में नागरिक ठिकाने बने निशाना, होर्मुज संकट से वैश्विक तेल बाजार में बढ़ी बेचैनी

नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव शुक्रवार को लगातार आठवें दिन और अधिक गंभीर हो गया। दोनों देशों ने हमलों का दायरा बढ़ाते हुए सैन्य एवं रणनीतिक प्रतिष्ठानों के साथ नागरिक बुनियादी ढांचों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। संघर्ष के दूसरे सप्ताह में प्रवेश करने के साथ ही पश्चिम एशिया में व्यापक युद्ध की आशंका गहराती जा रही है। खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, तेल प्रतिष्ठानों, बिजली संयंत्रों और जल आपूर्ति केंद्रों पर हमलों की खबरों ने पूरे क्षेत्र में भय और अस्थिरता का माहौल पैदा कर दिया है।

ईरान ने आरोप लगाया है कि अमेरिकी सेना की ओर से किए गए ताजा हवाई हमलों में उसके सात पुलों, एक रेलवे स्टेशन और ईरानशहर हवाई अड्डे समेत कई नागरिक एवं परिवहन ढांचों को निशाना बनाया गया। तेहरान का कहना है कि अमेरिकी हमले अब केवल उसके सैन्य प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि देश के अंदरूनी हिस्सों में स्थित सड़कों, पुलों, बंदरगाहों और अन्य आवश्यक सुविधाओं पर भी किए जा रहे हैं। अमेरिकी सेना ने हालांकि कहा है कि उसका अभियान ईरान की सैन्य क्षमता, निगरानी व्यवस्था, हथियार भंडार, समुद्री संचालन और रसद नेटवर्क को कमजोर करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है।

ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई को अपनी संप्रभुता और नागरिक सुरक्षा पर सीधा हमला बताते हुए कड़ी जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने दावा किया कि उसने खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों और उसके सहयोगी देशों के रणनीतिक प्रतिष्ठानों पर मिसाइलों तथा ड्रोन से हमले किए हैं। ईरान ने कहा है कि जब तक उसके बुनियादी ढांचों और नागरिक प्रतिष्ठानों पर हमले जारी रहेंगे, तब तक वह अमेरिकी हितों के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई का दायरा बढ़ाता रहेगा।

कुवैत में ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों से कई स्थानों पर धुएं के विशाल गुबार दिखाई दिए। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार बिजली उत्पादन और समुद्री जल को पीने योग्य बनाने वाले एक डिसैलिनेशन संयंत्र को भी नुकसान पहुंचा है। इसके बाद प्रशासन ने नागरिकों से बिजली और पानी का सीमित उपयोग करने की अपील की। ईरान की ओर से कुवैत के साथ बहरीन और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाए जाने का दावा किया गया है। जॉर्डन ने अपने हवाई क्षेत्र की ओर आने वाली कई मिसाइलों को रोकने की बात कही, जबकि बहरीन और अन्य खाड़ी देशों में हवाई हमले की चेतावनी देने वाले सायरन बजाए गए।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार उसके ताजा अभियानों में ईरान के निगरानी तंत्र, संचार केंद्रों, हथियार भंडारण स्थलों, सैन्य रसद केंद्रों और समुद्री हमले की क्षमता से जुड़े प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। अमेरिका ने क्षेत्र में लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों और सैनिकों की तैनाती भी बढ़ाई है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन अभियानों का लक्ष्य ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों पर हमले रोकने और समुद्री यातायात को दोबारा सामान्य करने के लिए मजबूर करना है।

इस संघर्ष का सबसे गंभीर प्रभाव होर्मुज जलडमरूमध्य पर दिखाई दे रहा है। यह संकरा समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से के तेल एवं गैस व्यापार का रास्ता माना जाता है। लगातार हमलों, जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तथा अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण इस मार्ग से होने वाला समुद्री यातायात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। कई अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी कंपनियां अपने जहाजों का मार्ग बदलने या उन्हें अस्थायी रूप से रोकने को मजबूर हुई हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति बिगड़ने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी चिंता बढ़ गई है। कच्चे तेल की कीमतें 85 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं और बाजार में आगे और उछाल की आशंका जताई जा रही है। संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में एक सप्ताह के भीतर तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद होता है या तेल टैंकरों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की भारी कमी और कीमतों में अप्रत्याशित उछाल आ सकता है।

तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत समेत उन देशों पर पड़ने की आशंका है, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं। महंगा कच्चा तेल पेट्रोल और डीजल की कीमतों, परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन तथा खाद्य वस्तुओं की महंगाई पर दबाव बढ़ा सकता है। इसके अलावा खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा, विमान सेवाओं और समुद्री व्यापार को लेकर भी चिंता बनी हुई है।

संघर्ष के दौरान नागरिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाए जाने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं। मानवीय संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली संयंत्र, जल शोधन केंद्र, पुल, रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे जैसी सुविधाएं आम नागरिकों के दैनिक जीवन से सीधे जुड़ी होती हैं। ऐसे प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचने से अस्पतालों, खाद्य आपूर्ति, पेयजल व्यवस्था और लोगों की आवाजाही पर गंभीर असर पड़ सकता है। नागरिक बुनियादी ढांचों पर जानबूझकर किए गए हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन की आशंका भी जताई जा रही है।

अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर संघर्ष को बढ़ाने और पहले से किए गए समझौतों का उल्लंघन करने का आरोप लगा रहे हैं। ईरान ने अमेरिका पर अपने वादों से पीछे हटने और उसके खिलाफ सैन्य तथा आर्थिक दबाव बढ़ाने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर अमेरिका का कहना है कि ईरान ने वाणिज्यिक जहाजों और क्षेत्र में उसके सहयोगी देशों पर हमले कर संघर्ष को दोबारा भड़काया। दोनों पक्ष फिलहाल पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहे हैं, जिससे कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं कमजोर होती दिखाई दे रही हैं।

क्षेत्रीय देशों के सामने भी कठिन चुनौती खड़ी हो गई है। कुवैत, बहरीन, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन जैसे देशों में अमेरिकी सैनिक एवं सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। ईरान ने चेतावनी दी है कि उसकी भूमि पर हमला करने के लिए इस्तेमाल होने वाले किसी भी ठिकाने को वह वैध लक्ष्य मानेगा। इससे ऐसे देशों के सीधे संघर्ष में शामिल होने का खतरा बढ़ गया है, जो अब तक युद्ध से दूरी बनाए रखने का प्रयास कर रहे थे।

विश्लेषकों का कहना है कि सैन्य कार्रवाई की मौजूदा गति को देखते हुए किसी एक हमले की गलत गणना भी पूरे पश्चिम एशिया को बड़े युद्ध में धकेल सकती है। यदि ईरान अपने क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों को सक्रिय करता है या लाल सागर और होर्मुज दोनों मार्गों पर जहाजों को रोकने का प्रयास करता है, तो यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। संघर्ष के लंबे समय तक जारी रहने से तेल, गैस, उर्वरक, खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

अमेरिका-ईरान संघर्ष अब केवल दो देशों के बीच सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रहा है। नागरिक ढांचों, खाड़ी देशों, समुद्री व्यापार मार्गों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर बढ़ते हमलों ने इसे वैश्विक आर्थिक एवं मानवीय संकट का रूप देना शुरू कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों पक्ष बातचीत और संघर्षविराम की दिशा में आगे बढ़ेंगे या जवाबी हमलों का यह सिलसिला पूरे पश्चिम एशिया को एक व्यापक और विनाशकारी युद्ध की ओर ले जाएगा।

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