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सिर्फ गाली देना नहीं है अश्लीलता, सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 294(बी) की सीमा की स्पष्ट की व्याख्या

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 294(बी) को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल गाली-गलौज या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल अपने आप में अश्लीलता (Obscenity) का अपराध नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक स्थान पर अभद्र या अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करना तभी आईपीसी की धारा 294(बी) के दायरे में आएगा, जब उन शब्दों या कृत्यों में वास्तविक रूप से अश्लीलता का तत्व मौजूद हो और उससे सार्वजनिक शालीनता प्रभावित होती हो। अदालत का यह फैसला न केवल कानून की व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों में पुलिस और निचली अदालतों के लिए भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 294 का उद्देश्य हर प्रकार की गाली या अपमानजनक भाषा को अपराध घोषित करना नहीं है। यह धारा केवल उन परिस्थितियों में लागू होती है, जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर अश्लील हरकत करता है, अश्लील गीत गाता है, अश्लील शब्द बोलता है या ऐसी भाषा का प्रयोग करता है जिससे आम लोगों को असुविधा, शर्मिंदगी या आपत्ति महसूस हो। अदालत ने कहा कि कानून में प्रयुक्त “अश्लीलता” शब्द का अर्थ केवल अपशब्द या गुस्से में कही गई बातें नहीं हैं, बल्कि ऐसे शब्द या व्यवहार हैं जो समाज की नैतिकता और सार्वजनिक शालीनता के स्थापित मानकों का उल्लंघन करते हों।

शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर विवाद, झगड़े या बहस के दौरान कही गई गाली को अश्लीलता मान लेना कानून की गलत व्याख्या होगी। न्यायालय ने कहा कि कई बार लोग गुस्से या आवेश में अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर बैठते हैं, लेकिन यदि उसमें यौन प्रकृति की अश्लीलता या सार्वजनिक नैतिकता को ठेस पहुंचाने वाला तत्व नहीं है, तो उसे धारा 294(बी) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। केवल किसी व्यक्ति को अपमानित करने के उद्देश्य से बोले गए शब्द स्वतः अश्लील नहीं हो जाते।

अदालत ने कहा कि धारा 294(बी) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए दो महत्वपूर्ण तत्वों का होना आवश्यक है। पहला, कथित शब्द, हरकत या गीत वास्तव में अश्लील होना चाहिए। दूसरा, उसका प्रभाव सार्वजनिक स्थान पर उपस्थित लोगों पर पड़ना चाहिए और उससे उन्हें परेशानी या आपत्ति होनी चाहिए। यदि इन दोनों में से कोई एक तत्व भी अनुपस्थित है, तो इस धारा के अंतर्गत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल एफआईआर में “गाली-गलौज” लिख देने से धारा 294 स्वतः लागू नहीं हो जाती।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य समाज में अनुशासन बनाए रखना है, लेकिन आपराधिक कानून का प्रयोग सोच-समझकर और सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। हर अपमानजनक टिप्पणी या अभद्र व्यवहार को आपराधिक अश्लीलता मान लेना नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाने जैसा होगा। इसलिए अदालतों और जांच एजेंसियों को प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का गहराई से परीक्षण करना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय देशभर में दर्ज होने वाले हजारों मामलों को प्रभावित कर सकता है। अक्सर देखा जाता है कि पड़ोसियों के विवाद, सड़क पर हुए झगड़े, पारिवारिक कहासुनी या अन्य छोटे विवादों में पुलिस आईपीसी की धारा 294(बी) भी जोड़ देती है। अब इस फैसले के बाद पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कथित शब्द वास्तव में अश्लीलता की श्रेणी में आते हैं या केवल अपमानजनक या गुस्से में कहे गए शब्द हैं। इससे अनावश्यक मुकदमों में कमी आने की संभावना जताई जा रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय न्यायपालिका पहले भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुकी है कि अश्लीलता की परिभाषा समय, समाज और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। किसी शब्द या अभिव्यक्ति को केवल इसलिए अश्लील नहीं माना जा सकता क्योंकि वह किसी व्यक्ति को बुरी लगी हो। यह देखना आवश्यक है कि क्या वह अभिव्यक्ति समाज के सामान्य नैतिक मानकों के अनुसार अश्लील मानी जाएगी और क्या उससे सार्वजनिक शालीनता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी संकेत दिया कि आपराधिक मामलों में कानून की धाराओं का यांत्रिक तरीके से उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। पुलिस को प्रत्येक मामले की वस्तुस्थिति का परीक्षण करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या आरोपित कृत्य वास्तव में उस अपराध की कानूनी परिभाषा में आता है। यदि केवल सामान्य गाली-गलौज हुई है और उसमें अश्लीलता का कोई तत्व नहीं है, तो धारा 294(बी) लगाने का कोई औचित्य नहीं होगा।

यह फैसला आम नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि कानून केवल हर प्रकार की अभद्र भाषा को अपराध नहीं मानता। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि गाली-गलौज को उचित ठहराया जा रहा है। यदि किसी व्यक्ति की भाषा से अन्य कानूनों के तहत अपराध बनता है, जैसे कि आपराधिक धमकी, मानहानि, शांति भंग करना या किसी विशेष वर्ग के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी करना, तो संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन केवल अश्लीलता के नाम पर धारा 294(बी) का प्रयोग तभी होगा जब उसके सभी आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद हों।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है। इससे न केवल आईपीसी की धारा 294(बी) की सीमा स्पष्ट हुई है, बल्कि पुलिस, अभियोजन और निचली अदालतों को भी यह संदेश मिला है कि किसी भी आपराधिक धारा का प्रयोग तथ्यों और कानून की कसौटी पर परखने के बाद ही किया जाना चाहिए। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह निर्णय नागरिकों के मौलिक अधिकारों और कानून के संतुलित उपयोग के बीच एक महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करता है तथा भविष्य में इस प्रकार के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और निष्पक्ष बनाने में सहायक सिद्ध होगा।

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