जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में हुए आतंकी हमले ने छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले के एक गरीब परिवार की दुनिया उजाड़ दी। हमले में जान गंवाने वाले 24 वर्षीय दीपक रात्रे अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य था। शादी का कर्ज चुकाने और परिवार को बेहतर जिंदगी देने की उम्मीद में वह करीब एक साल पहले जम्मू-कश्मीर मजदूरी करने गया था, लेकिन आतंकियों की गोलियों ने उसके सारे सपने खत्म कर दिए।
दीपक की मौत के बाद उसके गांव हरदीडीह में मातम पसरा हुआ है। जिस आंगन में कभी उसकी हंसी गूंजती थी, वहां अब सिर्फ सन्नाटा है। उसकी बूढ़ी नानी अब भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि उनका नाती हमेशा के लिए उनसे बिछड़ गया है।
परिजनों का आरोप- अंतिम दर्शन भी नहीं करने दिए
परिवार का आरोप है कि दीपक का अंतिम संस्कार जम्मू-कश्मीर में ही कर दिया गया और उन्हें अंतिम दर्शन तक का मौका नहीं मिला। दीपक के मामा ने बताया कि उनके दो भाई वहां मौजूद थे, लेकिन उन्हें भी मुखाग्नि देने की अनुमति नहीं दी गई। इस घटना से परिवार में गहरा आक्रोश है।
बहन बोली- राखी बांधना तो दूर, आखिरी बार चेहरा भी नहीं देखा
दीपक की ममेरी बहन ने नम आंखों से कहा कि वह हर साल अपने भाई को राखी बांधती थी। इस बार भी उसके लौटने का इंतजार कर रही थी, लेकिन अब न राखी बांध सकी और न ही अपने भाई का अंतिम बार चेहरा देख पाई। यह कहते हुए वह भावुक हो गई।
चार साल की उम्र में पिता का साया उठा
दीपक का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा। जब वह महज चार वर्ष का था, तभी उसके पिता का निधन हो गया। आर्थिक तंगी के कारण उसकी मां उसे लेकर मायके आ गई, जहां नानी और मामा के सहारे उसका पालन-पोषण हुआ। घर की जिम्मेदारियों के चलते उसे कम उम्र में ही पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करनी पड़ी।
शादी का कर्ज चुकाने गया था कश्मीर
करीब दो वर्ष पहले दीपक की शादी हुई थी। शादी के लिए लिया गया कर्ज चुकाने और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए वह अपनी पत्नी और भाई के साथ जम्मू-कश्मीर चला गया। वहां वह एक ईंट-भट्ठे पर मजदूरी कर रहा था।
मां, पत्नी, दिव्यांग भाई और बेटे का सहारा था
दीपक अपनी मां, दिव्यांग भाई, पत्नी और दो वर्षीय बेटे का इकलौता सहारा था। उसकी मौत के बाद पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक संकट में आ गया है। गांव के लोग बताते हैं कि वह मेहनती, शांत स्वभाव का और परिवार के प्रति पूरी तरह समर्पित युवक था।
पत्नी ने रोक लिया, बच गई मामा की जान
दीपक के मामा ने बताया कि वह भी जम्मू-कश्मीर जाने वाले थे, लेकिन उनकी पत्नी ने बच्चों की पढ़ाई का हवाला देकर उन्हें गांव में ही रोक लिया। अब उन्हें लगता है कि अगर उस दिन वे भी चले जाते तो शायद इस आतंकी हमले का शिकार हो जाते।
पलायन की मजबूरी बनी दर्द की वजह
ग्रामीणों का कहना है कि इलाके में मजदूरी बेहद कम मिलने के कारण हर साल दर्जनों परिवार रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। स्थानीय स्तर पर 300 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी से परिवार का गुजारा मुश्किल है, जबकि बाहर 800 से 1000 रुपये तक मजदूरी मिल जाती है। यही मजबूरी दीपक को भी कश्मीर ले गई।
परिवार ने मांगी पूरी जानकारी
परिजनों ने प्रशासन से मांग की है कि उन्हें पूरे घटनाक्रम की स्पष्ट जानकारी दी जाए। उनका कहना है कि बिना परिवार की सहमति और मौजूदगी के अंतिम संस्कार क्यों किया गया, इसका जवाब मिलना चाहिए। उनका दर्द है कि आतंकियों ने बेटे की जान ली, लेकिन उसे आखिरी बार न देख पाने का घाव जिंदगीभर नहीं भर पाएगा।
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