ऑस्ट्रेलिया में सोने की नई खदानों की तलाश तेज हो गई है। इसके लिए एक साल में करीब 13 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। सोने के विशाल भंडार और बढ़ते खनन निवेश के चलते ऑस्ट्रेलिया आने वाले समय में भारत के लिए सोने की सप्लाई का एक अहम स्रोत बन सकता है।
भारत में सोने की मांग काफी अधिक है, लेकिन घरेलू उत्पादन सीमित होने के कारण देश को अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया से सोने का कारोबार बढ़ने पर भारत को आयात के लिए एक अतिरिक्त विकल्प मिल सकता है।
ऑस्ट्रेलिया में सोने की खोज पर बढ़ा निवेश
ऑस्ट्रेलिया में सोने के नए भंडार खोजने के लिए कंपनियां बड़े स्तर पर निवेश कर रही हैं। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में ही सोने की खोज पर करीब 10,625 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। इस क्षेत्र में खनन गतिविधियां बढ़ने के साथ ड्रिलिंग मशीनों और अन्य उपकरणों की मांग भी बढ़ रही है।
अनुमानों के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में करीब 13 हजार टन सोने के संसाधन मौजूद हैं। यह दुनिया के कुल सोना संसाधनों का लगभग 20 प्रतिशत माना जाता है। हालांकि, संसाधनों का अनुमानित भंडार और व्यावसायिक रूप से निकाला जा सकने वाला सोना अलग-अलग होते हैं।
सोने की बढ़ती कीमतों से कंपनियों का रुझान बढ़ा
वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के बीच सोने को सुरक्षित निवेश का विकल्प माना जाता है। इसकी मांग और कीमतों में होने वाले बदलाव का असर खनन कंपनियों की निवेश योजनाओं पर भी पड़ता है।
इसी वजह से कंपनियां नए भंडार खोजने और मौजूदा खदानों में उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं। जून 2026 की तिमाही में ऑस्ट्रेलिया में सोने की खोज पर खर्च में 23.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई है।
ऑस्ट्रेलिया में सोने का उत्पादन भी महत्वपूर्ण
वर्ष 2025 में ऑस्ट्रेलिया में करीब 314 टन सोने का उत्पादन हुआ, जबकि दुनिया में कुल उत्पादन लगभग 3,300 टन रहा। इस आधार पर वैश्विक उत्पादन में ऑस्ट्रेलिया की हिस्सेदारी करीब 9.5 प्रतिशत थी।
ऑस्ट्रेलिया का विकसित खनन क्षेत्र और बड़े पैमाने पर खोज गतिविधियां उसे अंतरराष्ट्रीय सोना बाजार में महत्वपूर्ण स्थान दिलाती हैं। यदि नई खदानों की खोज सफल रहती है और वहां उत्पादन बढ़ता है, तो भविष्य में वैश्विक बाजार में सोने की उपलब्धता बढ़ सकती है।
भारत के लिए क्यों अहम है ऑस्ट्रेलिया?
भारत दुनिया के प्रमुख सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। यहां आभूषणों, निवेश और पारंपरिक मांग के कारण सोने की खपत अधिक रहती है। दूसरी ओर, देश का घरेलू उत्पादन कुल जरूरत के मुकाबले बहुत कम है।
भारत की सोने की आपूर्ति मुख्य रूप से तीन स्रोतों से होती है:
- आयात: विदेशों से सोना खरीदकर घरेलू मांग पूरी की जाती है।
- रिसाइक्लिंग: पुराने गहनों और सोने को दोबारा इस्तेमाल में लाया जाता है।
- घरेलू खनन: देश की खदानों से सीमित मात्रा में सोना निकाला जाता है।
ऑस्ट्रेलिया से कारोबार बढ़ने पर भारत को सोने की आपूर्ति के लिए एक और महत्वपूर्ण स्रोत मिल सकता है। इससे अलग-अलग देशों पर निर्भरता का संतुलन बनाने और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में आने वाली बाधाओं से निपटने में मदद मिल सकती है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया की खदानों में क्या है अंतर?
सोना जमीन से सीधे शुद्ध धातु के रूप में नहीं निकलता। इसे उन चट्टानों और खनिजों से निकाला जाता है, जिनमें सोने के कण मौजूद होते हैं। इस सामग्री को सोने का अयस्क कहा जाता है।
उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 50.18 करोड़ टन सोने के अयस्क का भंडार बताया गया है। इसमें प्रति टन औसतन करीब 1.17 ग्राम सोना मिलने का अनुमान है। इसके मुकाबले ऑस्ट्रेलिया के कुछ अयस्कों में प्रति टन करीब 10 ग्राम सोना होने का दावा किया गया है।
हालांकि, अयस्क में सोने की मात्रा हर खदान में एक जैसी नहीं होती। उत्पादन की लागत, खनन तकनीक, गहराई और पर्यावरणीय नियम भी यह तय करते हैं कि किसी भंडार से सोना निकालना कितना लाभदायक होगा।
क्या भारत में सोने की कीमतें कम होंगी?
ऑस्ट्रेलिया में नई खदानें मिलने और उत्पादन बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की आपूर्ति बढ़ सकती है। लेकिन इससे भारत में सोना सस्ता होने की गारंटी नहीं है।
सोने की कीमतें वैश्विक मांग, डॉलर की चाल, ब्याज दरों, भू-राजनीतिक तनाव, खनन लागत और आयात से जुड़े खर्चों पर भी निर्भर करती हैं। इसके अलावा, रुपये और डॉलर की विनिमय दर में बदलाव का असर भी भारत में सोने की कीमत पर पड़ता है।
कुल मिलाकर, ऑस्ट्रेलिया में सोने की खोज पर बढ़ता निवेश भारत के लिए भविष्य में एक अवसर बन सकता है। यदि नई खदानों से व्यावसायिक उत्पादन बढ़ता है और दोनों देशों के बीच कारोबार मजबूत होता है, तो भारत को सोने की आपूर्ति के लिए एक अतिरिक्त विकल्प मिल सकता है।
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