सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए बातचीत की कोशिशें तेज होने की खबर है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब हूती विद्रोहियों को हमले रोकने के बदले 1 अरब डॉलर यानी करीब 95 अरब रुपये की आर्थिक सहायता देने पर विचार कर रहा है। इस संभावित समझौते में ईरान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान बातचीत के सिलसिले में तेहरान पहुंचे। इस दौरान पाकिस्तान और तुर्किये के अधिकारियों की भागीदारी की भी खबर सामने आई है। हालांकि, आर्थिक सहायता से जुड़े प्रस्ताव और समझौते की शर्तों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना जरूरी है।
कब्जे वाले इलाकों को लौटाने की शर्त
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सऊदी अरब किसी भी नए युद्धविराम समझौते से पहले हूती विद्रोहियों से यमन सरकार के कब्जे वाले क्षेत्रों को वापस लौटाने की मांग कर रहा है। सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता रहा है।
हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और हवाई अड्डों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। क्षेत्रीय तनाव और समुद्री मार्गों पर खतरे के कारण तेल निर्यात तथा व्यापार पर भी असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।
पुरानी सहमति को लेकर भी विवाद
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच पहले भी आर्थिक सहायता और संघर्ष विराम को लेकर सहमति बनाने की कोशिश हुई थी। प्रस्तावित व्यवस्था में हूती नियंत्रित क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन और बुनियादी सुविधाओं के लिए सहायता देने की बात शामिल थी।
हालांकि, पुरानी सहमति को लागू करने को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं। हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर वादे पूरे नहीं करने के आरोप लगाए हैं, जबकि संघर्ष रोकने के लिए सुरक्षा और क्षेत्रीय नियंत्रण से जुड़े मुद्दे अब भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
आधुनिक हथियारों के बावजूद हूती चुनौती क्यों बने हुए हैं?
सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइल रक्षा प्रणाली और अन्य उन्नत सैन्य संसाधन हैं। इसके बावजूद हूती विद्रोहियों को पूरी तरह पराजित करना उसके लिए चुनौती बना हुआ है। यमन के बड़े हिस्से में हूतियों की मौजूदगी और उनकी ड्रोन व मिसाइल हमले करने की क्षमता इस संघर्ष को जटिल बनाती है।
ड्रोन और कम लागत वाले हथियारों से होने वाले हमलों को रोकने के लिए महंगी रक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। इससे लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई जारी रखने का खर्च बढ़ जाता है।
यमन का पहाड़ी भूगोल भी बड़ी बाधा
यमन के पहाड़ी इलाके सैन्य अभियानों को कठिन बनाते हैं। हवाई हमलों से किसी ठिकाने को नुकसान पहुंचाना संभव है, लेकिन पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करना आसान नहीं होता। इसके लिए व्यापक जमीनी अभियान की जरूरत पड़ सकती है, जिसमें सैनिकों के नुकसान और लंबे संघर्ष का जोखिम बना रहता है।
ऐसे हालात में कूटनीतिक बातचीत सऊदी अरब के लिए संघर्ष की लागत कम करने और क्षेत्रीय सुरक्षा बहाल करने का एक विकल्प हो सकती है। हालांकि, किसी अंतिम समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष हमले रोकने, क्षेत्रीय नियंत्रण और पिछली प्रतिबद्धताओं को लेकर किस तरह सहमति बनाते हैं।
नोट: 1 अरब डॉलर की पेशकश और तेहरान में हुई बातचीत से संबंधित विवरण मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। इन्हें आधिकारिक रूप से पुष्ट समझौता नहीं माना जाना चाहिए।
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