नई दिल्ली। चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तैनात भारतीय सेना की रसद व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम चल रहा है। रणनीति का उद्देश्य किसी एक सड़क, पुल या सप्लाई रूट पर निर्भरता कम करना है, ताकि किसी आपात स्थिति या मार्ग बाधित होने की स्थिति में भी सैनिकों तक हथियार, गोला-बारूद, ईंधन, राशन और अन्य जरूरी सामान पहुंचता रहे।
लद्दाख को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए फिलहाल श्रीनगर-करगिल-लेह और मनाली-लेह प्रमुख मार्ग हैं। इनके अलावा करीब 298 किलोमीटर लंबा निमू-पदम-दरचा मार्ग एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ते के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह मार्ग हिमाचल प्रदेश की ओर से जांस्कर होते हुए लद्दाख तक पहुंच बनाएगा।
शिंकुन ला सुरंग से मिलेगी सालभर कनेक्टिविटी
निमू-पदम-दरचा मार्ग की उपयोगिता को बढ़ाने के लिए शिंकुन ला में करीब 4.1 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुरंग तैयार होने के बाद इस मार्ग पर सालभर आवाजाही की संभावना बढ़ेगी और सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण संपर्क टूटने की समस्या कम हो सकती है।
वहीं, जोजिला सुरंग के जरिए श्रीनगर-करगिल-लेह मार्ग की ऑल-वेदर कनेक्टिविटी को मजबूत करने की तैयारी है। इससे लद्दाख के लिए पश्चिमी दिशा से आने वाली रसद व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
लद्दाख के अंदर भी बनाए जा रहे वैकल्पिक रास्ते
सिर्फ लद्दाख तक पहुंच बनाना ही पर्याप्त नहीं है। सेना के अग्रिम ठिकानों तक रसद पहुंचाने के लिए क्षेत्र के भीतर भी कई वैकल्पिक संपर्क मार्ग विकसित किए जा रहे हैं। इनमें हनुथांग-तुरतुक, खाल्त्से-बटालिक और करगिल-दुमगिल जैसे लिंक मार्ग शामिल हैं।
इसके अलावा खारदुंग ला और बटालिक क्षेत्र में सुरंग परियोजनाओं पर भी काम आगे बढ़ रहा है। इन परियोजनाओं से दुर्गम और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सैन्य आवाजाही तथा आपूर्ति को ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने में मदद मिलेगी।
ड्रोन हमलों से सुरक्षा पर भी जोर
आधुनिक युद्ध परिस्थितियों को देखते हुए सेना की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में ड्रोन हमलों से सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जा रही है। सप्लाई रूट, ईंधन भंडारण केंद्र और अन्य महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए काउंटर-ड्रोन सिस्टम, निगरानी व्यवस्था, सुरक्षित संचार नेटवर्क और फॉरवर्ड स्टोरेज सुविधाओं को मजबूत किया जा रहा है।
सर्दियों में स्टॉकिंग की चुनौती होगी कम
लद्दाख के ऊंचाई वाले इलाकों में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी और कठिन मौसम के कारण लंबे समय तक आवाजाही प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सेना को पहले से ही बड़ी मात्रा में राशन, ईंधन और अन्य आवश्यक सामग्री अग्रिम क्षेत्रों में पहुंचाकर रखनी पड़ती है।
यदि कई मार्ग सालभर चालू रहते हैं, तो सेना की विंटर स्टॉकिंग पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ आपूर्ति व्यवस्था में लचीलापन बढ़ सकता है। किसी एक मार्ग में बाधा आने पर वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
करीब 18 हजार करोड़ की परियोजनाओं पर काम
रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के मुताबिक करगिल-लेह-लद्दाख क्षेत्र में सड़क और सुरंग से जुड़ी करीब 18 हजार करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इनका व्यापक उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य गतिशीलता बढ़ाने के साथ रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों तक तेज और सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करना है।
क्यों जरूरी है मल्टी-रूट नेटवर्क?
पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में किसी एक दर्रे, पुल या सड़क के बंद होने से बड़े इलाके की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में एक से ज्यादा वैकल्पिक रास्ते सेना के लिए रणनीतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं।
मल्टी-रूट नेटवर्क के जरिए किसी एक मार्ग के बाधित होने पर दूसरे रास्ते से सैनिकों और अग्रिम चौकियों तक जरूरी सामग्री पहुंचाई जा सकती है। यही वजह है कि लद्दाख में अब केवल नई सड़कें बनाने के बजाय पूरी वैकल्पिक लॉजिस्टिक्स व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।
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