वॉशिंगटन। अमेरिका में काम करने, पढ़ाई करने और स्थायी रूप से बसने का सपना देखने वाले लाखों भारतीयों के लिए आने वाले समय में चुनौतियां बढ़ सकती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन H-1B वीजा, रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड, स्टूडेंट वीजा और अन्य रोजगार संबंधी आव्रजन नियमों को और सख्त करने की तैयारी में है। प्रस्तावित बदलाव लागू होने की स्थिति में सबसे अधिक प्रभाव भारतीय पेशेवरों, छात्रों और आईटी क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
अमेरिकी प्रशासन द्वारा जारी नियामक एजेंडा (Regulatory Agenda) के अनुसार आने वाले महीनों में H-1B वीजा कार्यक्रम, रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया, अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए उपलब्ध रोजगार अवसरों और वर्क परमिट से जुड़े कई नियमों में बदलाव किए जा सकते हैं। हालांकि ये प्रस्ताव अभी अंतिम रूप में लागू नहीं हुए हैं और इन्हें औपचारिक नियम निर्माण प्रक्रिया से गुजरना होगा, लेकिन इन्हें ट्रंप प्रशासन की स्पष्ट नीति दिशा माना जा रहा है।
H-1B वीजा अमेरिका में विदेशी कुशल पेशेवरों को रोजगार देने का प्रमुख माध्यम है और इसका सबसे अधिक लाभ भारतीय आईटी पेशेवरों को मिलता है। हर वर्ष हजारों भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, डॉक्टर, शोधकर्ता और अन्य विशेषज्ञ इसी वीजा के माध्यम से अमेरिका में कार्यरत होते हैं। यदि पात्रता, वेतन मानकों, नियोक्ताओं की जिम्मेदारी या चयन प्रक्रिया को और कठोर बनाया जाता है तो भारतीय आवेदकों के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं।
प्रस्तावित बदलावों का असर केवल नौकरीपेशा लोगों तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए स्टूडेंट वीजा और पढ़ाई पूरी होने के बाद मिलने वाले ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) कार्यक्रम की समीक्षा भी प्रस्तावित है। यदि इन नियमों में बदलाव होता है तो विदेशी छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद अमेरिका में नौकरी करने और आगे H-1B वीजा प्राप्त करने का रास्ता पहले की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है।
ग्रीन कार्ड से जुड़ी प्रक्रिया में भी बदलाव की संभावना जताई गई है। रोजगार आधारित स्थायी निवास (Employment-Based Green Card) के नियमों को और कड़ा किया जा सकता है। इसके साथ ही कुछ श्रेणियों में वर्क परमिट (Employment Authorization Document) के स्वतः विस्तार की व्यवस्था समाप्त करने का भी प्रस्ताव है। यदि ऐसा होता है तो कई विदेशी कर्मचारियों और उनके नियोक्ताओं को अतिरिक्त प्रशासनिक प्रक्रियाओं और संभावित देरी का सामना करना पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन पहले ही वीजा आवेदनों की जांच प्रक्रिया को और सख्त कर चुका है। अमेरिकी विदेश विभाग ने H-1B, H-4, F, M और J वीजा आवेदकों सहित कई श्रेणियों के लिए सोशल मीडिया प्रोफाइल की विस्तृत जांच का दायरा बढ़ाया है। आवेदकों को अपने सोशल मीडिया अकाउंट सार्वजनिक (Public) रखने के निर्देश भी दिए गए हैं ताकि सुरक्षा एजेंसियां उनकी ऑनलाइन गतिविधियों का मूल्यांकन कर सकें।
आव्रजन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित नियम लागू होते हैं तो अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति प्रक्रिया अधिक जटिल और समय लेने वाली हो सकती है। इससे उन भारतीय पेशेवरों पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है जो अमेरिकी टेक कंपनियों, स्वास्थ्य सेवाओं, वित्तीय संस्थानों और शोध संगठनों में रोजगार की तलाश कर रहे हैं।
भारत लंबे समय से H-1B वीजा प्राप्त करने वाले देशों में सबसे आगे रहा है। बड़ी संख्या में भारतीय छात्र भी उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका का रुख करते हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार के नए प्रतिबंध या अतिरिक्त शर्तों का असर भारतीय परिवारों, छात्रों और आईटी उद्योग पर व्यापक रूप से पड़ सकता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि फिलहाल ये केवल प्रस्तावित बदलाव हैं। इन्हें लागू होने से पहले नियम निर्माण, सार्वजनिक टिप्पणियों और प्रशासनिक मंजूरी जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसलिए वर्तमान वीजा धारकों और नए आवेदकों को घबराने के बजाय आधिकारिक घोषणाओं पर नजर रखने और आवश्यक दस्तावेज समय पर तैयार रखने की सलाह दी जा रही है।
यदि ट्रंप प्रशासन की यह नई आव्रजन नीति लागू होती है, तो अमेरिका में रोजगार और उच्च शिक्षा के अवसरों का स्वरूप बदल सकता है। भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक कठिन होगी, जबकि अमेरिकी कंपनियों को भी विदेशी प्रतिभाओं की भर्ती के लिए नए नियमों के अनुरूप अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है.
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