नई दिल्ली। देशभर में E20 इथेनोल-ब्लेंडेड पेट्रोल के इस्तेमाल को लेकर चल रही चर्चा के बीच पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मंगलवार, 7 जुलाई को सोशल मीडिया पर अपनी बात रखी। उन्होंने E20 पेट्रोल को लेकर फैल रही आशंकाओं और अफवाहों को भ्रामक बताते हुए कहा कि इससे वाहनों के इंजन को नुकसान पहुंचने की बात सही नहीं है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि जिन वाहनों का रखरखाव नियमित रूप से किया जा रहा है और जो निर्धारित मानकों के अनुरूप हैं, उनमें E20 ईंधन के इस्तेमाल से कोई गंभीर समस्या सामने नहीं आ रही है।
E20 पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनोल और 80 प्रतिशत पेट्रोल का मिश्रण होता है। सरकार का दावा है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और प्रदूषण घटाने में मदद मिलेगी। हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि इथेनोल ब्लेंडिंग कार्यक्रम भारत की ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आमदनी से जुड़ा महत्वपूर्ण अभियान है। सरकार के अनुसार भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनोल ब्लेंडिंग का लक्ष्य 2025 में ही हासिल कर लिया, जबकि मूल लक्ष्य 2030 का था।
हालांकि, सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में वाहन मालिक E20 पेट्रोल को लेकर सवाल उठा रहे हैं। लोगों की मुख्य चिंता माइलेज घटने, पुराने वाहनों के इंजन पर असर, रबर पार्ट्स और फ्यूल सिस्टम में संभावित खराबी को लेकर है। कई उपभोक्ताओं का कहना है कि E20 पेट्रोल आने के बाद वाहनों की औसत दूरी कम हुई है और रखरखाव खर्च बढ़ने की आशंका है। इसी बहस के बीच पेट्रोलियम मंत्री ने कहा कि माइलेज में मामूली अंतर कई कारणों से हो सकता है, लेकिन इसे इंजन खराब होने से जोड़ना सही नहीं है।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र से जुड़ी रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि नए और E20-अनुकूल वाहनों में समस्या की संभावना कम है, लेकिन पुराने E10-अनुकूल वाहनों में कुछ रबर कंपोनेंट, होज, गैस्केट, सील और ओ-रिंग जैसे पार्ट्स पर असर पड़ सकता है। ARAI से जुड़ी रिपोर्टों में पुराने वाहनों को लेकर सावधानी बरतने की बात सामने आई है। हालांकि दोपहिया वाहनों में बड़े स्तर पर गंभीर समस्या नहीं पाई गई है।
सरकार का पक्ष है कि इथेनोल भारत में गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है, जिससे किसानों को वैकल्पिक बाजार मिलता है। इससे पेट्रोल में जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी कम होती है और कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलती है। सरकार इसे “मेक इन इंडिया” और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।
वहीं उपभोक्ता संगठनों और कुछ वाहन मालिकों की मांग है कि पेट्रोल पंपों पर साफ-साफ बताया जाए कि ग्राहक को कितने प्रतिशत इथेनोल वाला पेट्रोल दिया जा रहा है। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दाखिल की गई है, जिसमें मांग की गई है कि हर फ्यूल डिस्पेंसिंग नोजल और बिल पर इथेनोल मिश्रण की जानकारी स्पष्ट रूप से दी जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि E20 पेट्रोल को लेकर असली चुनौती नीति की नहीं, बल्कि उपभोक्ता विश्वास की है। यदि सरकार वाहन कंपनियों, पेट्रोलियम कंपनियों और उपभोक्ताओं के बीच स्पष्ट संवाद बनाए तो भ्रम कम किया जा सकता है। पुराने वाहनों के लिए गाइडलाइन, पार्ट्स रिप्लेसमेंट की सलाह और पंपों पर स्पष्ट सूचना से विवाद को काफी हद तक शांत किया जा सकता है।
फिलहाल सरकार E20 पेट्रोल को देश की ऊर्जा नीति का अहम हिस्सा मानते हुए आगे बढ़ रही है, जबकि आम वाहन चालक इससे जुड़े व्यावहारिक प्रभावों को लेकर जवाब मांग रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा सिर्फ ईंधन नीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उपभोक्ता अधिकार, वाहन रखरखाव, किसानों की आय और पर्यावरण नीति से भी जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय विमर्श बन सकता है।
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