पटना। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में छात्रों के लिए एक बड़ा बदलाव किया गया है। अब शोध सहित स्नातक (प्रतिष्ठा) की डिग्री प्राप्त करने वाले छात्र बिना स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) किए सीधे पीएचडी में प्रवेश ले सकेंगे। नई व्यवस्था के तहत चार वर्षीय स्नातक (प्रतिष्ठा) कार्यक्रम में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्रों को शोध का अवसर मिलेगा, जिससे उनका शोध कार्य पहले ही शुरू हो जाएगा और उन्हें उच्च शिक्षा में आगे बढ़ने का तेज रास्ता मिलेगा।
नई व्यवस्था के अनुसार चार वर्षीय स्नातक (प्रतिष्ठा) पाठ्यक्रम के पहले छह सेमेस्टर में जिन छात्रों का सीजीपीए 7.5 या उससे अधिक होगा, उन्हें स्नातक (प्रतिष्ठा) के साथ शोध (Honours with Research) करने का विकल्प दिया जाएगा। ऐसे छात्र चौथे वर्ष में शोध कार्य के साथ-साथ पीएचडी के लिए आवश्यक कोर्स वर्क भी पूरा करेंगे। इससे उन्हें भविष्य में सीधे पीएचडी कार्यक्रम में प्रवेश लेने की पात्रता प्राप्त हो जाएगी।
वहीं जिन छात्रों का पहले छह सेमेस्टर में सीजीपीए 7.5 से कम रहेगा, उन्हें शोध का विकल्प नहीं मिलेगा। ऐसे छात्रों को सामान्य स्नातक (प्रतिष्ठा) की डिग्री प्रदान की जाएगी। यदि वे आगे शोध करना चाहते हैं तो उन्हें पहले स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करनी होगी और उसके बाद निर्धारित नियमों के अनुसार पीएचडी में प्रवेश मिल सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के अनुरूप तैयार की गई है। नई शिक्षा नीति का उद्देश्य छात्रों को लचीली, बहु-विषयक और शोध आधारित शिक्षा उपलब्ध कराना है। इसी क्रम में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को इस प्रकार तैयार किया गया है कि मेधावी छात्र कम समय में उच्च स्तरीय शोध कार्य की ओर अग्रसर हो सकें।
शोध सहित स्नातक (प्रतिष्ठा) की डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों को चौथे वर्ष में शोध परियोजना, शोध पद्धति (Research Methodology) और पीएचडी से जुड़े आवश्यक कोर्स पढ़ाए जाएंगे। इससे उन्हें शोध कार्य की प्रारंभिक समझ विकसित होगी और वे पीएचडी में प्रवेश के बाद सीधे अपने शोध विषय पर कार्य शुरू कर सकेंगे। इससे छात्रों का समय भी बचेगा और उन्हें अलग से स्नातकोत्तर करने की अनिवार्यता नहीं रहेगी।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस नई व्यवस्था से देश में शोध संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। अब प्रतिभाशाली छात्र स्नातक स्तर से ही अनुसंधान के क्षेत्र में आगे बढ़ सकेंगे। इससे विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शोध को प्रोत्साहन मिलेगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेगी।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि शोध सहित स्नातक कार्यक्रम में प्रवेश और उसकी गुणवत्ता बनाए रखना विश्वविद्यालयों के लिए बड़ी जिम्मेदारी होगी। शोध कार्य के लिए प्रशिक्षित संकाय, आधुनिक प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, डिजिटल संसाधन और प्रभावी मूल्यांकन प्रणाली की आवश्यकता होगी। तभी इस नई व्यवस्था का वास्तविक लाभ छात्रों को मिल सकेगा।
छात्र संगठनों और शिक्षाविदों ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे मेधावी छात्रों को अपने करियर में तेजी से आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि शोध की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए विश्वविद्यालयों को चयन प्रक्रिया और मूल्यांकन प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाना होगा।
नई व्यवस्था लागू होने के बाद चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में अध्ययन करने वाले छात्रों के लिए बेहतर शैक्षणिक प्रदर्शन और शोध कार्य का महत्व पहले से अधिक बढ़ जाएगा। 7.5 या उससे अधिक सीजीपीए प्राप्त करने वाले छात्रों को सीधे पीएचडी तक पहुंचने का अवसर मिलेगा, जबकि अन्य छात्र पारंपरिक शैक्षणिक मार्ग के तहत स्नातकोत्तर के बाद शोध की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।
उच्च शिक्षा में यह बदलाव छात्रों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलने वाला माना जा रहा है। इससे शोध के क्षेत्र में युवा प्रतिभाओं की भागीदारी बढ़ेगी, समय की बचत होगी और देश में ज्ञान आधारित शिक्षा व्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद है।
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