वॉशिंगटन डीसी। अमेरिका में H-1B वीजा के जरिए काम करने वाले विदेशी पेशेवरों को लेकर विवाद गहरा गया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस व्यवस्था की आलोचना करते हुए विदेशी कर्मचारियों को ‘बंधुआ मजदूर’ बताया। उनके बयान पर भारत ने आपत्ति जताई और कहा कि प्रवासी पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था, तकनीकी विकास और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारतीय पेशेवर अमेरिका में नई तकनीक, अनुसंधान और आर्थिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। इससे भारत और अमेरिका, दोनों देशों को लाभ मिलता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में H-1B वीजा प्राप्त करने वालों में भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी लगभग 71 प्रतिशत है।
विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति पर वेंस ने उठाए सवाल
जेडी वेंस ने अमेरिकी कंपनियों की भर्ती नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता देने के बजाय अमेरिकी नागरिकों को रोजगार के अवसर दिए जाने चाहिए। उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट का उदाहरण देते हुए दावा किया कि कंपनी ने पिछले एक साल में करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला, जबकि इसी अवधि में उसे 6,300 H-1B वीजा और लगभग 3,000 ग्रीन कार्ड का लाभ मिला।
वेंस ने इस स्थिति की आलोचना करते हुए वीजा व्यवस्था में बदलाव की मांग की। उनके बयान ने अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति, स्थानीय रोजगार और तकनीकी कंपनियों की भर्ती नीतियों को लेकर चल रही बहस को फिर चर्चा में ला दिया है।
H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड में क्या है अंतर?
H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को निर्धारित शर्तों के तहत नौकरी पर रखने की अनुमति देता है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से आईटी, इंजीनियरिंग, अनुसंधान और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में किया जाता है।
वहीं, ग्रीन कार्ड अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और काम करने की अनुमति देता है। रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड की कई श्रेणियों में PERM लेबर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। इस प्रक्रिया के तहत नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति से समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और कार्य परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा संबंधित नियमों का पालन किया गया है।
आठ आईटी कंपनियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर कार्रवाई
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन ने आठ प्रमुख आईटी कंपनियों की PERM प्रक्रिया पर रोक लगाने या उन्हें निलंबित करने की कार्रवाई की है। इनमें इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, HCL, कॉग्निजेंट, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और कैपजेमिनी के नाम शामिल हैं।
अमेरिकी प्रशासन की ओर से विदेशी कर्मचारियों की भर्ती और अमेरिकी नागरिकों के रोजगार अवसरों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इस कार्रवाई के दायरे और अवधि से जुड़ी जानकारी की आधिकारिक पुष्टि महत्वपूर्ण है।
PERM प्रक्रिया प्रभावित होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित कर्मचारियों के पहले से जारी H-1B वीजा स्वतः रद्द हो जाएंगे। लेकिन जिन कर्मचारियों की रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया इस चरण पर निर्भर है, उनके स्थायी निवास से जुड़े आवेदन में देरी हो सकती है।
भारतीय पेशेवरों पर क्या पड़ सकता है असर?
अमेरिका की वीजा नीतियों में सख्ती का असर भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिकी कंपनियों में काम करने की योजना बना रहे कुशल कर्मचारियों पर पड़ सकता है। विशेष रूप से उन लोगों को चिंता हो सकती है, जिनकी ग्रीन कार्ड प्रक्रिया रोजगारदाता कंपनी के माध्यम से चल रही है।
दूसरी ओर, भारतीय पेशेवर अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे हैं और सॉफ्टवेयर विकास, अनुसंधान तथा नवाचार में योगदान देते हैं। ऐसे में H-1B वीजा को लेकर जारी बहस का असर केवल विदेशी कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिकी कंपनियों की भर्ती रणनीति और दोनों देशों के तकनीकी सहयोग पर भी पड़ सकता है।
नोट: वीजा संबंधी कार्रवाई, कंपनियों की सूची और बताए गए आंकड़ों की पुष्टि के लिए अमेरिकी प्रशासन तथा संबंधित कंपनियों के आधिकारिक बयानों को देखना आवश्यक है।
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