स्टॉकहोम। अंतरिक्ष से धरती तक पहुंचने वाले बेहद ऊर्जावान न्यूट्रिनो को पकड़ने और उनके स्रोतों का पता लगाने की दिशा में किए गए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक काम को 2026 के भौतिकी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इस शोध ने वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली अंतरिक्षीय घटनाओं को समझने का एक नया रास्ता दिया।
इस वैज्ञानिक उपलब्धि की सबसे खास बात यह है कि न्यूट्रिनो को पकड़ने के लिए दक्षिणी ध्रुव की विशाल और साफ बर्फ का इस्तेमाल किया गया। करीब एक घन किलोमीटर बर्फ के भीतर हजारों प्रकाश-संवेदी सेंसर लगाए गए, जो न्यूट्रिनो के बर्फ में मौजूद परमाणुओं से टकराने पर पैदा होने वाली बेहद हल्की चमक को रिकॉर्ड करते हैं।
न्यूट्रिनो क्यों हैं इतने खास?
न्यूट्रिनो बेहद छोटे कण हैं, जो सूरज, तारों और अंतरिक्ष में होने वाली अत्यंत शक्तिशाली घटनाओं से निकलते हैं। हर सेकंड अरबों न्यूट्रिनो पृथ्वी और हमारे शरीर के आर-पार गुजरते हैं, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में इनका पता लगाना बेहद मुश्किल होता है।
इन कणों की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे अंतरिक्ष से लगभग सीधी दिशा में धरती तक पहुंच सकते हैं और रास्ते में बहुत कम प्रभावित होते हैं। ऐसे में अगर वैज्ञानिक किसी न्यूट्रिनो को पकड़ लेते हैं, तो उसके रास्ते के आधार पर यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि वह ब्रह्मांड के किस हिस्से और किस घटना से आया है।
बर्फ के अंदर बनाया गया विशाल डिटेक्टर
न्यूट्रिनो के बेहद कम टकराने की प्रवृत्ति के कारण इन्हें पकड़ने के लिए बहुत बड़े डिटेक्टर की जरूरत होती है। इसी चुनौती को देखते हुए दक्षिणी ध्रुव की गहरी बर्फ को ही विशाल डिटेक्टर के तौर पर इस्तेमाल करने का विचार सामने आया।
इस योजना के तहत करीब 1.5 से 2.5 किलोमीटर की गहराई में सेंसर लगाए गए। जब कोई न्यूट्रिनो बर्फ के अंदर मौजूद परमाणु से टकराता है, तो उससे पैदा होने वाली हल्की रोशनी को ये सेंसर रिकॉर्ड कर लेते हैं। इसी संकेत के जरिए वैज्ञानिक न्यूट्रिनो की दिशा और ऊर्जा के बारे में जानकारी हासिल करते हैं।
2011 में पूरा हुआ आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी का निर्माण
इस विचार से आगे चलकर आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी तैयार हुई। इसका निर्माण 2011 में पूरा हुआ। यहां दर्ज किए गए उच्च-ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो ने वैज्ञानिकों को सौरमंडल से बहुत दूर मौजूद खगोलीय स्रोतों और वहां होने वाली शक्तिशाली घटनाओं के अध्ययन का नया माध्यम दिया।
पहले ब्रह्मांड को समझने के लिए वैज्ञानिक मुख्य रूप से दिखाई देने वाली रोशनी, एक्स-रे और दूसरी विद्युतचुंबकीय किरणों का सहारा लेते थे। न्यूट्रिनो ने इस तस्वीर में एक नया आयाम जोड़ दिया। अब वैज्ञानिक इन कणों की दिशा और ऊर्जा के आधार पर उन घटनाओं का अध्ययन कर सकते हैं, जहां से वे निकले हैं।
एक अलग सोच ने बदल दिया शोध का तरीका
न्यूट्रिनो पर काम शुरू करने के दौरान इस क्षेत्र में व्यापक विशेषज्ञता न होने के बावजूद वैज्ञानिकों ने समस्या को अलग नजरिए से देखा। उस समय सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अंतरिक्ष से आने वाले अत्यधिक ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो को किस तरह रिकॉर्ड किया जाए।
दक्षिणी ध्रुव की बर्फ को विशाल प्राकृतिक डिटेक्टर के रूप में इस्तेमाल करने का विचार इसी चुनौती का जवाब बना। बर्फ के अंदर बड़ी संख्या में सेंसर लगाने से बेहद दुर्लभ न्यूट्रिनो टक्करों से पैदा होने वाले प्रकाश संकेतों को दर्ज करना संभव हुआ।
शुरुआती प्रयोग से शुरू हुई बड़ी वैज्ञानिक परियोजना
इस विचार को आगे बढ़ाने के शुरुआती दौर में अंटार्कटिका की बर्फ के अंदर फोटोमल्टिप्लायर लगाने के प्रयोग किए गए। शुरुआती स्तर पर किए गए इन प्रयासों ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि बर्फ के भीतर मौजूद प्रकाश-संकेतों को किस तरह रिकॉर्ड किया जा सकता है।
बाद में इस दिशा में रिसर्च के लिए आर्थिक मदद मिली और परियोजना का विस्तार हुआ। धीरे-धीरे यही प्रयास एक ऐसी विशाल वेधशाला में बदल गया, जिसने अंतरिक्ष से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो के अध्ययन को नई दिशा दी।
वैज्ञानिकों के लिए यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यूट्रिनो के जरिए ब्रह्मांड को देखने का तरीका पारंपरिक दूरबीनों से अलग है। इन कणों की मदद से उन शक्तिशाली अंतरिक्षीय घटनाओं के बारे में भी जानकारी हासिल की जा सकती है, जिनका अध्ययन केवल रोशनी के जरिए करना मुश्किल होता है।
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