खागा, फतेहपुर। किशुनपुर रोड स्थित शोभावती अस्पताल में बीते एक सितंबर को इंजेक्शन लगने के बाद रेनू देवी की मौत हो गई थी। परिजनों ने अप्रशिक्षित स्टाफ द्वारा गलत इंजेक्शन लगाए जाने का आरोप लगाया था। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने अगले ही दिन अस्पताल को सीज कर दिया था।
आरोप है कि मानक पूरे किए बिना ही दो सप्ताह के भीतर अस्पताल को दोबारा खोल दिया गया। मृतका के पति महेश का आरोप है कि अस्पताल संचालक ने स्वास्थ्य विभाग में सेटिंग के बल पर अस्पताल दोबारा शुरू करवा लिया। बेसमेंट में संचालित इस अस्पताल में आज भी एंट्री और एग्जिट के लिए उचित गेट नहीं है और न ही आपातकालीन निकासी की कोई व्यवस्था है।
पीड़ित जब कोतवाली खागा में मुकदमा दर्ज कराने के लिए प्रार्थना पत्र लेकर पहुंचा तो आरोप है कि प्रभारी निरीक्षक ने उसे फटकार लगाकर वहां से टरका दिया। इसके बाद वह न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। पूरे मामले ने कोतवाली पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गौरतलब है कि सीएमओ खुद कह चुके हैं कि सीज अस्पताल को दोबारा तभी खोला जाता है, जब संचालक मरीज के परिजनों से समझौता कर लेता है। लेकिन इस मामले में परिजनों का कहना है कि न तो कोई समझौता हुआ और न ही अस्पताल ने निर्धारित मानकों को पूरा किया, फिर भी उसे दोबारा खोल दिया गया।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बेसमेंट में क्लीनिक का संचालन किया जा सकता है? क्या उचित प्रवेश द्वार और इमरजेंसी एग्जिट के बिना कोई अस्पताल मरीजों की सुरक्षा से जुड़े मानकों को पूरा कर सकता है? आखिर निजी अस्पतालों के संचालन के लिए निर्धारित मानक क्या हैं? यदि मानक पूरे नहीं किए गए हैं तो सीज अस्पताल को किस आधार पर दोबारा खोलने की अनुमति दी गई?
यह मामला केवल नियम-कायदों तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे मरीजों की जिंदगी और सुरक्षा से जुड़ा है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को अस्पताल दोबारा खोले जाने के आधार और कार्रवाई को लेकर स्पष्ट जवाब देना होगा।
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