संवाददाता
सैयद समीर हुसैन
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मुंब्रा: मुंब्रा क्षेत्र में वन विभाग की भूमि पर वर्षों से रह रहे लोगों और अवैध निर्माण के मुद्दे को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वन विभाग की जमीन पर कथित अतिक्रमण और निर्माण के मामलों को लेकर कुछ लोग समाजसेवक, फर्ज़ी पत्रकार या राजनीतिक दल के कार्यकर्ता होने का दावा कर वन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ लगातार शिकायतें और पत्रबाजी कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन शिकायतों का उद्देश्य हमेशा जनहित नहीं होता, बल्कि कुछ मामलों में कथित तौर पर अधिकारियों पर दबाव बनाकर आर्थिक लाभ लेने की कोशिश की जाती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
बताया जाता है कि मुंब्रा में बड़ी संख्या में परिवार लंबे समय से वन भूमि से जुड़े क्षेत्रों में रहकर अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। इनमें गरीब और आदिवासी परिवार भी शामिल हैं। इसी स्थिति का कथित तौर पर कुछ भू-माफियाओं ने भी फायदा उठाया और वन विभाग की जमीन पर कब्जे कर व्यावसायिक निर्माण शुरू किए जाने के आरोप सामने आते रहे हैं।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, अवैध निर्माण अथवा वन भूमि पर रहने वाले लोगों की जानकारी को आधार बनाकर कुछ कथित बिचौलिए संबंधित लोगों से संपर्क करते हैं। आरोप है कि उनसे हज़ारों रुपये लेकर मामला “मैनेज” कराने का दावा किया जाता है। स्थानीय स्तर पर ऐसी कथित रकम 10 से 20 हज़ार रुपये तक होने की बात कही जा रही है। हालांकि, इन दावों की पुष्टि के लिए ठोस दस्तावेज़ या आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आना अभी बाकी है।
शिकायतों के दबाव से किसे फायदा?
स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि लगातार शिकायतें, पत्रबाजी और अधिकारियों पर दबाव बनाने से वास्तव में अवैध निर्माण रुकते, तो पिछले कई वर्षों में वन भूमि से जुड़े विवाद समाप्त क्यों नहीं हुए? उनका कहना है कि अवैध निर्माण और अतिक्रमण की समस्या अब भी बनी हुई है। ये ब्लैक मेलर पत्र व्यवहार कर के वन मंत्री गणेश नाइक,और अन्य वन विभाग से जुड़े बड़े मंत्रियों अधिकारियों की धमकी देकर अधिकारियों पर कथित तौर पर दबाव बनाना चाहते है ताकि उनका काम आसानी से हो सके,
दूसरी ओर, वन विभाग के अधिकारी अपने विभागीय नियमों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई करते हैं। किसी भी वन भूमि मामले में संबंधित धाराओं, रिकॉर्ड और मौके की स्थिति को देखते हुए कार्रवाई की जानी होती है।
ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या वन विभाग की कार्रवाई के नाम पर कोई समानांतर कथित वसूली तंत्र काम कर रहा है? यदि ऐसा है तो इसकी निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।
अधिकारियों से जानकारी लीक होने का भी आरोप
कुछ स्थानीय लोगों ने यह आरोप भी लगाया है कि वन भूमि पर रहने वाले या निर्माण करने वाले लोगों की व्यक्तिगत जानकारी विभाग के भीतर से बाहर पहुंच रही है। इसके बाद कथित तौर पर अलग-अलग लोगों से संपर्क किया जाता है।
हालांकि, यह आरोप गंभीर है और इसकी पुष्टि के लिए दस्तावेजी साक्ष्य तथा संबंधित अधिकारियों का पक्ष आवश्यक होगा। बिना प्रमाण किसी अधिकारी या व्यक्ति को इस कथित नेटवर्क का हिस्सा बताना उचित नहीं होगा।
आगे हो सकता है नामों का खुलासा
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले में शामिल बताए जा रहे लोगों के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है। आने वाले समय में यदि दस्तावेज और स्वतंत्र रूप से सत्यापित साक्ष्य सामने आते हैं तो संबंधित लोगों के नाम और उनकी कथित भूमिका सार्वजनिक किए जाने की बात कही जा रही है।
फिलहाल जरूरत इस बात की है कि वन भूमि पर वास्तविक अतिक्रमण और अवैध निर्माण के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो, जबकि वर्षों से रह रहे गरीब और आदिवासी परिवारों के मामलों को भी कानूनी रिकॉर्ड और उपलब्ध अधिकारों के आधार पर निष्पक्ष रूप से देखा जाए।

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