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Heat Index In India: तापमान से ज्यादा गर्म क्यों लगती है हवा? जानिए हीट इंडेक्स का विज्ञान

Heat Index In India: 40 डिग्री तापमान में 45 डिग्री जैसी गर्मी महसूस होने का कारण हीट इंडेक्स है, जिसमें नमी और उच्च तापमान मिलकर शरीर को ठंडा होने से रोकते हैं. इसके अलावा घटती हरियाली भी एक वजह है.

Heat Index In India: इस साल गर्मी ने अपने तेवर शुरुआत से ही कड़े कर लिए हैं. अप्रैल के महीने में ही उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में पारा 40 से 42 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया जा रहा है. आम तौर पर इस तापमान को सहन करने की एक सीमा होती है, लेकिन इन दिनों स्थिति ऐसी है कि 40 डिग्री का तापमान भी शरीर को 45-46 डिग्री जैसी तपन का एहसास करा रहा है. यह महज एक भ्रम नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक कारण छिपा है. हम विकास की अंधी दौड़ में कंक्रीट के जंगलों में घिरते जा रहे हैं, जिसका सीधा असर हमारे आसपास के वातावरण और हमारी सहनशक्ति पर पड़ रहा है

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जब हम गर्मी महसूस करते हैं, तो वह केवल हवा का तापमान नहीं होता, बल्कि हीट इंडेक्स का कमाल होता है. यह तापमान और हवा में मौजूद नमी का एक मिला-जुला प्रभाव है. विज्ञान के अनुसार, हमारा शरीर पसीने के माध्यम से खुद को ठंडा रखता है.
जब हम गर्मी महसूस करते हैं, तो वह केवल हवा का तापमान नहीं होता, बल्कि हीट इंडेक्स का कमाल होता है. यह तापमान और हवा में मौजूद नमी का एक मिला-जुला प्रभाव है. विज्ञान के अनुसार, हमारा शरीर पसीने के माध्यम से खुद को ठंडा रखता है.
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जब हवा में नमी यानी ह्यूमिडिटी ज्यादा होती है, तो त्वचा का पसीना सूख नहीं पाता. पसीना सूखने की यह धीमी प्रक्रिया शरीर को राहत नहीं दे पाती, जिससे हमें वास्तविक तापमान से कहीं अधिक गर्मी महसूस होती है.

जब हवा में नमी यानी ह्यूमिडिटी ज्यादा होती है, तो त्वचा का पसीना सूख नहीं पाता. पसीना सूखने की यह धीमी प्रक्रिया शरीर को राहत नहीं दे पाती, जिससे हमें वास्तविक तापमान से कहीं अधिक गर्मी महसूस होती है.
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बारिश के मौसम या समुद्र तटीय इलाकों में अक्सर लोग इसी कारण से दमघोंटू गर्मी का अनुभव करते हैं. आजकल शहरों में ऊंची इमारतें, डामर की सड़कें और कंक्रीट के ढांचे सूरज की गर्मी को सोखने का काम करते हैं. इन सतहों में गर्मी को जज्ब करने और उसे लंबे समय तक छोड़ने की क्षमता होती है, जिसे अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहा जाता है.
बारिश के मौसम या समुद्र तटीय इलाकों में अक्सर लोग इसी कारण से दमघोंटू गर्मी का अनुभव करते हैं. आजकल शहरों में ऊंची इमारतें, डामर की सड़कें और कंक्रीट के ढांचे सूरज की गर्मी को सोखने का काम करते हैं. इन सतहों में गर्मी को जज्ब करने और उसे लंबे समय तक छोड़ने की क्षमता होती है, जिसे अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहा जाता है.
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शहर रात भर इस गर्मी को छोड़ते रहते हैं, जिससे रातें भी उमस भरी हो जाती हैं. इसके विपरीत, गांवों में हरियाली और खुली जगह होने के कारण तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है. इसके साथ ही, शहरों में ऊंची इमारतें हवा के प्राकृतिक बहाव को रोक देती हैं, जिससे पसीने को सुखाने वाली ठंडी हवा हम तक पहुंच ही नहीं पाती है.
शहर रात भर इस गर्मी को छोड़ते रहते हैं, जिससे रातें भी उमस भरी हो जाती हैं. इसके विपरीत, गांवों में हरियाली और खुली जगह होने के कारण तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है. इसके साथ ही, शहरों में ऊंची इमारतें हवा के प्राकृतिक बहाव को रोक देती हैं, जिससे पसीने को सुखाने वाली ठंडी हवा हम तक पहुंच ही नहीं पाती है.
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पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ा है. हीट वेव यानी लू की अवधि अब पहले से कहीं अधिक लंबी हो गई है, जिससे शरीर को खुद को सामान्य तापमान पर लाने का मौका ही नहीं मिलता है. हवा में मौजूद धूल और प्रदूषण के महीन कण गर्मी को वातावरण में ही फंसा लेते हैं.
पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ा है. हीट वेव यानी लू की अवधि अब पहले से कहीं अधिक लंबी हो गई है, जिससे शरीर को खुद को सामान्य तापमान पर लाने का मौका ही नहीं मिलता है. हवा में मौजूद धूल और प्रदूषण के महीन कण गर्मी को वातावरण में ही फंसा लेते हैं.
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इसके अलावा, शहरों में चलने वाली मशीनों, एयर कंडीशनर और वाहनों से निकलने वाली कृत्रिम गर्मी भी हमारे आस-पास के वातावरण को और अधिक गर्म बना देती है. दोपहर के समय सूरज की सीधी यूवी किरणें हमारे शरीर को झुलसाने के लिए काफी होती हैं, जो महसूस होने वाली गर्मी में इजाफा करती हैं.
इसके अलावा, शहरों में चलने वाली मशीनों, एयर कंडीशनर और वाहनों से निकलने वाली कृत्रिम गर्मी भी हमारे आस-पास के वातावरण को और अधिक गर्म बना देती है. दोपहर के समय सूरज की सीधी यूवी किरणें हमारे शरीर को झुलसाने के लिए काफी होती हैं, जो महसूस होने वाली गर्मी में इजाफा करती हैं.
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हर व्यक्ति की गर्मी सहने की क्षमता भिन्न होती है, लेकिन शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन इस क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करती है. जब शरीर में पानी कम होता है, तो उसका आंतरिक तापमान नियंत्रण तंत्र फेल होने लगता है, जिससे चक्कर आना और थकान होना स्वाभाविक है.
हर व्यक्ति की गर्मी सहने की क्षमता भिन्न होती है, लेकिन शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन इस क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करती है. जब शरीर में पानी कम होता है, तो उसका आंतरिक तापमान नियंत्रण तंत्र फेल होने लगता है, जिससे चक्कर आना और थकान होना स्वाभाविक है.
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हमारे कपड़ों का चुनाव भी इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. गहरे रंग के कपड़े गर्मी को सोखते हैं, जबकि तंग कपड़े हवा के प्रवाह को रोकते हैं. हल्के रंग के सूती और ढीले कपड़े न केवल पसीने को सोखने में मदद करते हैं, बल्कि हवा को त्वचा तक पहुंचने का मौका भी देते हैं, जिससे शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है.
हमारे कपड़ों का चुनाव भी इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. गहरे रंग के कपड़े गर्मी को सोखते हैं, जबकि तंग कपड़े हवा के प्रवाह को रोकते हैं. हल्के रंग के सूती और ढीले कपड़े न केवल पसीने को सोखने में मदद करते हैं, बल्कि हवा को त्वचा तक पहुंचने का मौका भी देते हैं, जिससे शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है.

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