नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर 3 से 5 सितंबर तक यूक्रेन और पोलैंड की तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर जाएंगे। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच होने वाली जयशंकर की यूक्रेन यात्रा को भारत की कूटनीतिक सक्रियता के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, यात्रा के दौरान एस. जयशंकर यूक्रेन के विदेश मंत्री आंद्रिय सिबिहा और पोलैंड के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। दोनों देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करने के साथ क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भी चर्चा होने की संभावना है।
यूक्रेन यात्रा क्यों है खास?
जयशंकर की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष लगातार जारी है। ऐसे में भारत की ओर से यूक्रेन के साथ सीधे उच्चस्तरीय संवाद को अहम कूटनीतिक कदम माना जा रहा है।
भारत लंबे समय से रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति के रास्ते पर जोर देता रहा है। जयशंकर की यात्रा के दौरान युद्ध की स्थिति, क्षेत्रीय सुरक्षा और शांति प्रयासों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श होने की उम्मीद है।
पोलैंड से भी होगी महत्वपूर्ण बातचीत
यूक्रेन के बाद जयशंकर पोलैंड जाएंगे। भारत और पोलैंड के बीच व्यापार, निवेश, रक्षा, तकनीक और यूरोप के साथ संपर्क जैसे मुद्दे दोनों देशों के संबंधों में महत्वपूर्ण हैं।
पोलैंड की भौगोलिक स्थिति भी इस यात्रा को खास बनाती है, क्योंकि वह यूक्रेन का पड़ोसी देश है और यूरोप में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिका निभाता है। ऐसे में पोलैंड के साथ बातचीत के दौरान यूरोप की मौजूदा सुरक्षा स्थिति और क्षेत्रीय घटनाक्रम पर चर्चा महत्वपूर्ण हो सकती है।
हाल में रूस का दौरा कर चुके हैं जयशंकर
विदेश मंत्री एस. जयशंकर इससे पहले 23 और 24 अगस्त को रूस के आधिकारिक दौरे पर गए थे। इस दौरान उन्होंने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ मुलाकात की थी और भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग के सत्र की सह-अध्यक्षता की थी।
रूस के बाद यूक्रेन और पोलैंड की यात्रा को भारत की संतुलित और सक्रिय विदेश नीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। एक ओर भारत रूस के साथ अपने पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर यूक्रेन और यूरोपीय देशों के साथ भी संवाद बढ़ा रहा है।
क्षेत्रीय घटनाक्रम पर रहेगी नजर
तीन दिवसीय यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संबंधों के अलावा क्षेत्रीय घटनाक्रम और आपसी हित से जुड़े मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान होगा। युद्ध के बीच भारत की यह उच्चस्तरीय कूटनीतिक पहल आने वाले समय में यूरोप और दोनों पक्षों के साथ भारत के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
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