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“अजीब दलील, बड़ा फैसला: ‘चूहों ने खाए पैसे’ केस में महिला अफसर को जमानत”

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के एक भ्रष्टाचार मामले में चूहों द्वारा रिश्वत के सबूत नष्ट करने पर हैरानी जताई है। कोर्ट ने इसे न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए सरकारी तंत्र की लापरवाही बताया।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। न्याय की प्रक्रिया में सबूतों का सुरक्षित रहना अनिवार्य है, लेकिन बिहार के एक भ्रष्टाचार मामले में जो सामने आया, वह किसी फिल्म की पटकथा जैसा मालूम होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान उस समय गहरा आश्चर्य व्यक्त किया, जब उसे यह जानकारी मिली कि भ्रष्टाचार के एक मामले में आरोपित के कब्जे से कथित तौर पर जब्त किए गए नोटों को चूहों ने कुतर कर नष्ट कर दिया है।

क्या है मामला?

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस घटना को अत्यंत गंभीर बताते हुए इसे राज्य के लिए ‘राजस्व की भारी हानि’ करार दिया। यह मामला वर्ष 2014 का है, जब बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) के पद पर तैनात एक महिला पर 10 हजार रुपये रिश्वत लेने का आरोप लगा था।

सुनवाई के दौरान जब हाईकोर्ट के पिछले वर्ष के फैसले का उल्लेख हुआ, तो यह तथ्य सामने आया कि जिस ‘मालखाने’ में जब्त की गई नकदी रखी गई थी, वहां की खराब स्थिति के कारण चूहों ने नोटों को बर्बाद कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल के अपने आदेश में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि चूहों द्वारा नोट नष्ट करने का जो स्पष्टीकरण दिया गया है, वह कतई विश्वास के योग्य नहीं है। कोर्ट ने चिंता व्यक्त की कि आखिर ऐसे कितने और मामले होंगे जहां जब्त की गई बेशकीमती नकदी असुरक्षित स्थानों पर रखे जाने के कारण बर्बाद हो जाती होगी।

कोर्ट ने इसे केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह माना है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता महिला की सजा को निलंबित करते हुए उसे जमानत दे दी है। यह महिला पहले ट्रायल कोर्ट से बरी हो गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे दोषी करार दिया था।

सरकारी तंत्र की पोल खोलती घटना

अब इस पूरे मामले की आगे सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट इस बात पर भी गौर करेगा कि आखिर सरकारी खजाने की सुरक्षा में ऐसी चूक कैसे हुई। यह घटना सरकारी तंत्र की उस व्यवस्था की पोल खोलती है जहां साक्ष्यों का संरक्षण ही खुद सुरक्षित नहीं है।

यदि भ्रष्टाचार के सबूतों का हश्र ‘चूहों का निवाला’ बनना है, तो फिर न्याय की उम्मीद किससे की जाए? यह सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के प्रति घोर उदासीनता का प्रतीक है। कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में मालखानों की सुरक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए एक चेतावनी की तरह है।

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