Breaking News

नक्सली मुठभेड़ में पति को खोने के बाद भी नहीं टूटी मां, बच्चे के लिए बनी हिम्मत की मिसाल

जिंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां हर रास्ता धुंधला नजर आता है, लेकिन एक मां के भीतर छिपी ताकत हर अंधेरे को चीरकर उजाला कर देती है। एमपीपीएससी लॉ ऑफिसर अनीता शुक्ला की कहानी इसी अदम्य साहस, जिम्मेदारी और मातृत्व के अटूट संकल्प की मिसाल है। अनीता शुक्ला ने बताया, मेरे जीवन में वह दर्दनाक पल तब आया, जब बालाघाट थाने में प्रभारी मेरे पति नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गए। उस वक्त बेटा मात्र 3 वर्ष का था। यह समय उनके लिए सबसे कठिन था। वह एक गृहिणी थीं, लेकिन शिक्षा लॉ तक होने के कारण उन्हें अनुकंपा नियुक्ति में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की नौकरी मिली।

संघर्ष के बीच नई शुरुआत

नौकरी की शुरुआत आसान नहीं थी। प्रैक्टिस के लिए उन्हें चार साल तक देवास में रहना पड़ा। इस दौरान परिवार से दूरी और अकेले संघर्ष ने उन्हें और मजबूत बनाया, लेकिन इस बीच उनका सबसे बड़ा चिंता का विषय था उनका बेटा, जिसकी परवरिश और भविष्य दोनों दांव पर थे।

बेटा हुआ बीमार

इन चार वर्षों में उनके बेटे का वजन असामान्य रूप से बढ़कर 80 किलो तक पहुंच गया। एक मां के लिए यह चिंता का बड़ा कारण था। इंदौर में पोस्टिंग मिलने के बाद उन्होंने बेटे को अपने पास बुलाया और उसकी जिंदगी को नई दिशा देने का निर्णय लिया।

खेल बना बदलाव की शुरुआत

अनीता ने बताया, बेटे को खेल से जोड़ने का फैसला लिया और उसे बास्केटबॉल की ट्रेनिंग दिलाना शुरू किया। खुद भी खिलाड़ी रही अनीता रोज उसे कॉम्प्लेक्स लेकर जातीं। एक ओर बेटा मैदान में पसीना बहाता, तो दूसरी ओर मां वहीं बैठकर अपनी ऑफिस फाइलें पढ़तीं। यह दृश्य एक मां के संघर्ष और समर्पण की जीवंत तस्वीर था। डॉक्टरों ने बेटे को बाहर का खाना बंद कर दिया तो अनीता ने घर पर ही खाना बनाना सीख लिया।

बेटे ने चुना खुद का रास्ता

बेटा आज न्यूजीलैंड में बिजनेस मैनेजमेंट के क्षेत्र में कार्यरत है। उसने मां से कहा कि वह ‘सेफ जोन’ से बाहर निकलकर पहचान बनाना चाहता है। मां के लिए यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन अनीता ने हिम्मत दिखाते हुए उसे आगे बढ़ने की आजादी दी।

दिया ये संदेश

अनीता की कहानी बताती है कि मां सिर्फ संतान को जन्म ही नहीं देती, बल्कि हर मुश्किल में उसका सहारा बनती है। उन्होंने आंसुओं को ताकत में बदला और बेटे के भविष्य को संवारने में समर्पित कर दिया। यह सिर्फ एक मां की कहानी नहीं, बल्कि उस अडिग विश्वास की मिसाल है, जो हर हाल में बच्चे के लिए खड़ी रहती है। यह प्रेरणा देती है कि चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, एक मां अपने साहस और प्रेम से हर लड़ाई जीत सकती है।

About NW-Editor

Check Also

TRE परीक्षा की मांग को लेकर पटना में बवाल, सड़कों पर उतरे अभ्यर्थी

बिहार की राजधानी पटना में शिक्षक भर्ती परीक्षा (TRE-4) की मांग कर रहे अभ्यर्थियों पर …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *