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अमेरिका में वोटर लिस्ट की जांच तेज, 10 लाख भारतवंशी मतदाताओं के नाम पर मंडरा रहा खतरा

न्यूयॉर्क। अमेरिका में मतदाता सूचियों की व्यापक जांच और उन्हें सरकारी रिकॉर्ड से मिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस कवायद का उद्देश्य देशभर की वोटर लिस्ट को अपडेट कर एक राष्ट्रीय स्तर का डेटाबेस तैयार करना बताया जा रहा है। इसके लिए करीब 125 करोड़ रुपये के फंड की व्यवस्था की गई है।

इस प्रक्रिया का असर अमेरिका में रहने वाले भारतवंशी मतदाताओं पर भी पड़ सकता है। अमेरिका में करीब 26 लाख भारतवंशी मतदाता बताए जाते हैं। इनमें से लगभग 10 लाख लोगों के नाम जांच के दायरे में आने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, वास्तव में कितने मतदाताओं के नाम सूची से हटेंगे, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

ICE को दी गई डेटाबेस की निगरानी की जिम्मेदारी

ट्रम्प प्रशासन ने वोटर डेटाबेस की निगरानी की जिम्मेदारी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) को दी है। सभी 50 राज्यों में मतदाता सूचियों की जांच और रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए कंपनियों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है।

इस प्रक्रिया में मतदाताओं की जानकारी को अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड से मिलाया जाएगा। नाम, पता, नागरिकता और अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड में किसी तरह का अंतर मिलने पर संबंधित मतदाता की जानकारी की दोबारा जांच की जा सकती है।

भारत की तरह घर-घर जाकर नहीं होगा सर्वे

अमेरिका में इस प्रक्रिया के तहत भारत की तरह घर-घर जाकर मतदाताओं का सर्वे करने की व्यवस्था नहीं है। इसके बजाय कंप्यूटर आधारित सिस्टम के जरिए वोटर लिस्ट का मिलान इमिग्रेशन रिकॉर्ड और अन्य सरकारी आंकड़ों से किया जाएगा।

रिकॉर्ड में जानकारी का मेल नहीं होने पर संबंधित मतदाता की पात्रता की जांच की जा सकती है। जांच में मतदाता का रिकॉर्ड योग्य नहीं पाए जाने पर उसका नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने की स्थिति भी बन सकती है।

भारतवंशी मतदाताओं पर क्यों पड़ सकता है असर?

अमेरिका में भारतवंशी समुदाय की संख्या और राजनीतिक भागीदारी लगातार महत्वपूर्ण मानी जाती है। न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में भारतवंशी मतदाताओं की अच्छी संख्या है।

अमेरिका में मतदाता पंजीकरण और पहचान से जुड़े नियम सभी राज्यों में एक जैसे नहीं हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर रिकॉर्ड के मिलान की प्रक्रिया के दौरान अलग-अलग राज्यों के मतदाताओं की जानकारी की जांच की जा सकती है।

हालांकि, भारतवंशी मतदाताओं के कितने नाम वास्तव में हटाए जाएंगे, इसका अभी कोई अंतिम आंकड़ा सामने नहीं आया है।

ट्रम्प वोटर आईडी व्यवस्था के समर्थक

डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से मतदान के दौरान फोटो पहचान पत्र को अनिवार्य करने की मांग का समर्थन करते रहे हैं। उनका तर्क है कि मजबूत पहचान व्यवस्था से चुनावी प्रक्रिया में संभावित गड़बड़ियों को रोकने में मदद मिल सकती है।

इसी दिशा में प्रस्तावित ‘सेव अमेरिका एक्ट’ में मतदाता पंजीकरण के समय नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण और मतदान के दौरान फोटो आईडी की आवश्यकता जैसे प्रावधान शामिल हैं।

विधेयक में डाक से मतदान की प्रक्रिया को सीमित करने से जुड़े प्रस्ताव भी शामिल हैं। इसे लेकर अमेरिका में राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं।

अमेरिका में भारत जैसी केंद्रीय चुनाव व्यवस्था नहीं

अमेरिका की चुनाव व्यवस्था भारत से काफी अलग है। वहां भारत के निर्वाचन आयोग जैसी एक केंद्रीय संस्था पूरे देश में चुनावों का संचालन नहीं करती। चुनाव से जुड़े काम मुख्य रूप से राज्यों और स्थानीय प्रशासन के जिम्मे होते हैं।

इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में मतदाता पंजीकरण, पहचान और मतदान से जुड़े नियम अलग हो सकते हैं। कुछ राज्यों में पहचान की घोषणा पर्याप्त हो सकती है, जबकि कुछ राज्यों में पहचान संबंधी दस्तावेज मांगे जाते हैं।

कुछ राज्यों में पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में मतदाता के हस्ताक्षर का मिलान भी प्रक्रिया का हिस्सा है।

टेक्सास में पहले भी हुआ था विवाद

टेक्सास में हजारों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने को लेकर पहले विवाद सामने आ चुका है। इस मामले में अदालत की दखल के बाद प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे थे और मामला कानूनी स्तर पर भी पहुंचा।

ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर वोटर लिस्ट की नई जांच और डेटाबेस तैयार करने की प्रक्रिया को लेकर भी कानूनी चुनौती की संभावना जताई जा रही है। खासकर उन राज्यों में यह मुद्दा ज्यादा अहम हो सकता है जहां प्रवासी समुदाय के मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।

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