बिंदकी, फतेहपुर। व्यावसायिक नगरी में बस अड्डे की नई इमारत तैयार हो गई है। परिसर भी चमचमा रहा है। यात्रियों के लिए व्यवस्था का इंतजाम भी हो चुका है, लेकिन जिस चीज का इंतजार अभी खत्म नहीं हो सका है, वह है बसों की नियमित आवाजाही।
करीब 2.82 करोड़ रुपये की स्वीकृत लागत से चमकाए गए बिंदकी बस अड्डे की तस्वीर कुछ ऐसी ही कहानी बयां करती नजर आ रही है। फतेहपुर डिपो की बसें तो बस अड्डे के परिसर में दिखाई दे रही हैं, लेकिन बांदा समेत अन्य डिपो की बसें अब भी गांधी चौराहे पर ही सवारियां बैठाती और उतारती हैं। नतीजा यह है कि बस अड्डा तैयार होने के बावजूद उसकी रौनक पूरी तरह लौट नहीं पाई है।
सुबह से शाम तक बस अड्डे की ओर नजर जाती है तो उम्मीद रहती है कि आज अलग-अलग रूट की बसें परिसर में आएंगी, यात्री उतरेंगे और नई सवारियां बैठेंगी। मगर दूसरे डिपो की बसों का संचालन यहां नियमित न होने से यह दृश्य पूरी तरह आकार नहीं ले पाता।
उधर, गांधी चौराहा अब भी यात्रियों के लिए प्रमुख ठिकाना बना हुआ है। बांदा और दूसरे रूट की बसें वहीं रुकती हैं। यात्री सड़क किनारे खड़े होकर बस का इंतजार करते हैं और बस आने पर वहीं से चढ़ते-उतरते हैं।
नए बस अड्डे के निर्माण के पीछे मकसद यात्रियों को व्यवस्थित सुविधा देना और बसों के संचालन को एक जगह लाना था। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि इमारत बनी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उसका पूरा इस्तेमाल हो रहा है? अगर यात्रियों को अब भी प्रमुख रूटों की बसें पकड़ने के लिए गांधी चौराहे तक जाना पड़ रहा है तो नए बस अड्डे का उद्देश्य आधा-अधूरा ही नजर आता है।
दिन ढलते ही बस अड्डे की तस्वीर और भी अलग हो जाती है। रोडवेज बसों की आवाजाही कम होने के साथ परिसर में चार पहिया समेत निजी वाहनों की मौजूदगी बढ़ जाती है। जिस जगह यात्रियों की चहल-पहल और बसों की कतार दिखाई देनी चाहिए, वहां निजी वाहनों का जमावड़ा नजर आता है।
स्थानीय लोगों के लिए यह स्थिति इसलिए भी खटकती है क्योंकि उन्होंने नए बस अड्डे से सिर्फ नई इमारत की नहीं, बल्कि बेहतर यातायात व्यवस्था और आसान सफर की उम्मीद भी पाल रखी है।
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