प्रदेश अध्यक्ष फरीद अहमद बोले- मदरसों ने देश को दिए शिक्षित और जिम्मेदार नागरिक, चंद मामलों से पूरी व्यवस्था को बदनाम करना गलत
फतेहपुर। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा मदरसों को आतंकवाद से जोड़कर दिए गए बयान पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऑफ इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष फरीद अहमद ने तीखा पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के अपराध या संदिग्ध गतिविधि के आधार पर पूरे मदरसा तंत्र और वहां शिक्षा प्राप्त करने वाले लाखों लोगों को कठघरे में खड़ा करना न तो न्यायसंगत है और न ही देश के सामाजिक सौहार्द के हित में है।
फरीद अहमद ने कहा कि मदरसे सदियों से शिक्षा के केंद्र रहे हैं। यहां धार्मिक शिक्षा के साथ भाषा, साहित्य और सामाजिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती रही है। आज अनेक मदरसों में आधुनिक विषयों को भी शामिल किया जा रहा है। यदि किसी विशेष संस्था या व्यक्ति के खिलाफ राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के ठोस प्रमाण हैं तो सरकार कानून के तहत कठोर कार्रवाई करे, लेकिन उसके आधार पर सभी मदरसों पर सवाल खड़ा करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि देश का मुस्लिम समाज शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, न्यायपालिका, प्रशासन, सेना, खेल, साहित्य, पत्रकारिता और कारोबार सहित हर क्षेत्र में योगदान देता आया है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने साधारण परिवार से निकलकर अपनी शिक्षा, प्रतिभा और मेहनत के बल पर विज्ञान के क्षेत्र में विश्वस्तरीय पहचान बनाई और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचे। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी नागरिक की देशभक्ति और योग्यता को उसके धर्म के आधार पर नहीं आंका जा सकता।
फरीद अहमद ने स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम समाज और उलेमा के योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि मौलाना अबुल कलाम आजाद स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में रहे और स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री बने। अशफाक उल्ला खां ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मौलाना हुसैन अहमद मदनी सहित अनेक उलेमा ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया। देश की आजादी और निर्माण में मुस्लिम समाज के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
प्रदेश अध्यक्ष ने कहा, “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। जो देश के खिलाफ काम करे, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से हो, उसके खिलाफ कठोरतम कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन किसी अपराधी के धर्म के आधार पर पूरे समुदाय और उसके शिक्षण संस्थानों को आतंकवाद से जोड़ देना कहां तक उचित है?”
उन्होंने कहा कि मदरसों से शिक्षा प्राप्त करने वाले बड़ी संख्या में लोग आज शिक्षक, अधिवक्ता, धर्मगुरु, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और कारोबारी के रूप में समाज एवं देश की सेवा कर रहे हैं। मदरसों के विद्यार्थियों को आधुनिक शिक्षा और रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है, न कि उनके मन में यह भावना पैदा करने की कि उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है।
फरीद अहमद ने कहा कि भारत संविधान से चलता है और संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता एवं सम्मान का अधिकार देता है। राजनीतिक एवं संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि उनके वक्तव्य समाज में दूरी पैदा करने के बजाय आपसी भाईचारे और विश्वास को मजबूत करें।
उन्होंने उप मुख्यमंत्री से अपने बयान पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए कहा कि यदि सरकार मदरसों में शिक्षा की गुणवत्ता, पारदर्शिता और आधुनिक पाठ्यक्रम को लेकर सुधार करना चाहती है तो सार्थक संवाद होना चाहिए। मदरसों में विज्ञान, गणित, अंग्रेजी, कंप्यूटर और कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देकर विद्यार्थियों के लिए रोजगार के नए रास्ते खोले जाने चाहिए।
फरीद अहमद ने कहा कि “मदरसे आतंकवाद के नहीं, तालीम के मरकज हैं। देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और किसी भी राष्ट्रविरोधी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, लेकिन देशभक्ति का प्रमाण किसी एक समुदाय से मांगना और पूरे मदरसा तंत्र को कटघरे में खड़ा करना स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
उन्होंने मुस्लिम समाज से भी अपील की कि बच्चों को धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा दिलाने पर विशेष ध्यान दें, ताकि नई पीढ़ी डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायविद और उद्यमी बनकर देश की प्रगति में अपनी भूमिका और मजबूत कर सके।

News Wani