बिहार सरकार ने छात्र प्रदर्शन के दौरान एके-47 से फायरिंग की बात सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार की है। लेकिन इसके साथ ही सरकार ने दावा किया है कि इस घटना में कोई भी घायल नहीं हुआ है। राज्य सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की बर्बरता के आरोपों वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में एक जवाबी हलफनामा दायर किया है। इसमें प्रदर्शनकारियों को नुकसान पहुंचाने के लिए जरूरत से ज्यादा बल के इस्तेमाल से साफ इनकार किया गया है।
छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कथित बर्बरता और जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के आरोपों पर बिहार और दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपने-अपने जवाब दाखिल किए हैं। बिहार सरकार ने प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 से हवा में चार गोलियां चलाने की बात स्वीकार की है। वहीं, दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से इनकार किया है।
बिहार सरकार ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान कई जगह हिंसा हुई और पुलिस तथा सरकारी कर्मचारियों पर हमले किए गए। छपरा में दो बीडीओ, तीन इंस्पेक्टर, दो सब-इंस्पेक्टर और 11 कांस्टेबल घायल हुए। एक बीडीओ की आंख चली गई, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल हुआ। राज्य के मुताबिक कुल 157 पुलिसकर्मी और सात सरकारी कर्मचारी घायल हुए। हलफनामे के अनुसार, 22 से 25 जुलाई के बीच बिहार में 69 एफआईआर दर्ज हुईं और करीब 500 लोगों को गिरफ्तार किया गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले 222 छात्र प्रदर्शनकारियों को जमानत पर छोड़ा गया। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने 75 नाबालिगों को भी रिहा किया।
दिल्ली पुलिस ने अपने जवाब में कहा कि संसद मार्च की अनुमति नहीं दी गई थी। इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड की कई परतें तोड़कर संसद की ओर बढ़ने की कोशिश की और प्रदर्शन हिंसक हो गया। पुलिस के मुताबिक, करीब 5000 जवान तीन किलोमीटर के इलाके में 30 हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ को संभाल रहे थे। पुलिस ने दावा किया कि संघर्ष के दौरान 240 से ज्यादा पुलिसकर्मी और करीब 200 प्रदर्शनकारी या आम लोग घायल हुए। पुलिस का कहना है कि ऐसी स्थिति में अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप सही नहीं है, क्योंकि भीड़ में आपराधिक रिकॉर्ड वाले और असामाजिक तत्व भी शामिल थे।
नाखून वाली लाठी पर भी सफाई
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान नाखून लगी लाठी के इस्तेमाल के आरोप को भी खारिज किया। उसका कहना है कि वीडियो में ऐसी एक घटना दिखाई देती है, लेकिन वह लाठी पुलिसकर्मी के हाथ में नहीं, बल्कि एक प्रदर्शनकारी के पास थी। पुलिस ने कहा कि सामान्य लाठियों का इस्तेमाल भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अनुमत तरीका है। पुलिस ने सादे कपड़ों में तैनात अधिकारियों का भी बचाव किया। उसके मुताबिक, स्पेशल ब्रांच, स्पेशल सेल, क्राइम ब्रांच और स्थानीय पुलिस के ‘स्पॉटर्स’ भीड़ में शामिल होकर स्थिति पर नजर रख रहे थे। यह तरीका बड़े सार्वजनिक आयोजनों में भी अपनाया जाता है।
प्रदर्शन स्थल पर फेशियल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल पर दिल्ली पुलिस ने कहा कि यह केवल गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की पहचान के लिए इस्तेमाल किया गया। पुलिस के अनुसार, किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल चेहरे की पहचान के आधार पर कार्रवाई नहीं की जाती। पहले मौके पर उसकी मौजूदगी की पुष्टि की जाती है। दिल्ली पुलिस ने यह भी कहा कि प्रदर्शन से जुड़े 2,873 लोगों पर हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, दुष्कर्म और POCSO जैसे गंभीर मामलों में आपराधिक आरोप हैं। इन मामलों की जांच विशेष जांच दल करेगा। दोनों पुलिस बलों ने कहा है कि उनके इस्तेमाल किए गए बल की वैधता और परिस्थितियों की जांच अदालत द्वारा गठित समिति के सामने की जा सकती है और वे जांच में सहयोग करेंगे।
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