नेपाल। 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ ने नेपाल में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। शुरुआती आकलन के मुताबिक बाढ़ से करीब 400 अरब नेपाली रुपये के नुकसान का अनुमान है। आपदा में अब तक 1,344 शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि करीब 5 हजार लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक, शनिवार शाम तक 13,101 लोगों को सुरक्षित बचाया जा चुका था। बाढ़ के कारण हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं और कई इलाकों में संपर्क तथा आवागमन व्यवस्था बाधित हुई है।
7,570 घर और 100 से ज्यादा पुल प्रभावित
बाढ़ से करीब 7,570 घरों को नुकसान पहुंचा है। लगभग 55 किलोमीटर सड़कें, 37 सड़क पुल और 68 झूला पुल क्षतिग्रस्त हुए हैं। इसके अलावा 1,806 हेक्टेयर कृषि भूमि भी प्रभावित हुई है।
बाढ़ का असर नेपाल के ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ा है। करीब 13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, एक सोलर प्रोजेक्ट और दो बिजली ट्रांसमिशन लाइनें क्षतिग्रस्त हुई हैं। इससे लगभग 783 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है।
पर्यटन कारोबार पर बढ़ा संकट
नेपाल में सितंबर से नवंबर के बीच पर्यटन का पीक सीजन रहता है, लेकिन बाढ़ की तस्वीरों और नुकसान की खबरों के बाद विदेशी पर्यटकों की बुकिंग पर असर पड़ने लगा है। कई होटल और ट्रैवल कंपनियों को कैंसिलेशन का सामना करना पड़ रहा है।
सरकार ने पर्यटकों को यह संदेश देने के लिए ‘नेपाल कॉलिंग’ अभियान शुरू किया है। सरकार का कहना है कि काठमांडू, पोखरा, चितवन, लुंबिनी, जनकपुर, अन्नपूर्णा और एवरेस्ट जैसे प्रमुख पर्यटन स्थल और एयरपोर्ट खुले हैं। हालांकि, कुछ ट्रेकिंग रूट अभी प्रभावित या प्रतिबंधित हैं।
राहत और पुनर्निर्माण के लिए बड़ी रकम की जरूरत
सरकार के शुरुआती अनुमान के अनुसार, बाढ़ प्रभावित लोगों के बचाव, राहत और तत्काल प्रबंधन के लिए अगले छह महीनों में करीब 8 अरब नेपाली रुपये की जरूरत पड़ सकती है। इसके बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए व्यापक योजना तैयार की जाएगी।
ग्लेशियल झीलों से बाढ़ का खतरा भी चिंता का विषय
नेपाल में ग्लेशियल झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। सरकार चार संवेदनशील ग्लेशियल झीलों का जलस्तर कम करने से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार केवल झीलों का पानी कम करना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, जल प्रवाह नियंत्रण और संवेदनशील इलाकों में निर्माण पर रोक जैसे उपाय भी जरूरी हैं।
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