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32 साल पुराने दीवानी विवाद में बहाली की अर्जी पर घमासान, विपक्ष ने उठाए कानूनी सवाल

फतेहपुर। करीब तीन दशक पुराने दीवानी मुकदमे को लेकर एक बार फिर विवाद सामने आया है। सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में चल रहे वाद संख्या 36/1994 प्रेम सिंह बनाम राजेंद्र सिंह आदि से संबंधित दस्तावेजों में मुकदमे की पुरानी कार्रवाई, अपील और बाद में दाखिल बहाली प्रार्थना पत्र का उल्लेख किया गया है। मामले में 23 जुलाई को राजेंद्र सिंह की ओर से बहाली प्रार्थना पत्र का विरोध करते हुए उसे खारिज किए जाने की मांग की गई है।

दस्तावेजों के अनुसार, मूल वाद प्रेम सिंह की ओर से वर्ष 1994 में दाखिल किया गया था। अदालत ने 11 अक्टूबर 1994 को प्रारंभिक तकनीकी कार्रवाई की और 12 अक्टूबर 1995 को एक आदेश पारित किया। इसके बाद प्रेम सिंह की ओर से पारित आदेश के विरुद्ध सिविल अपील संख्या 26/2009 दाखिल किए जाने का उल्लेख दस्तावेजों में है।

अपील की कार्रवाई के दौरान प्रेम सिंह की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके स्थान पर उनके पक्षकारों के नाम दर्ज किए गए। दस्तावेजों में यह भी उल्लेख है कि अपील 28 मार्च 2012 को स्वीकार हुई थी। इसके बाद की कार्रवाई में उच्च न्यायालय इलाहाबाद में प्रथम अपील संख्या 2843/2012 दाखिल की गई। उच्च न्यायालय द्वारा 4 अप्रैल 2024 को उक्त प्रथम अपील निरस्त किए जाने की बात भी अभिलेखों में दर्ज है।

इसी बीच मूल दीवानी वाद को लेकर 6 अप्रैल 2023 के आदेश का मामला सामने आया। दस्तावेजों के अनुसार, उक्त तारीख को पक्षकारों की अनुपस्थिति में वाद खारिज कर दिया गया था। दूसरी ओर, वादी पक्ष का कहना है कि उसे वाद खारिज होने की जानकारी तत्काल नहीं थी। 24 अप्रैल 2024 को पत्रावली के निरीक्षण के बाद 6 अप्रैल 2023 के आदेश की जानकारी होने का दावा किया गया है।

इसके बाद वादी पक्ष की ओर से वाद की बहाली के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किए जाने की बात दस्तावेजों में दर्ज है। वहीं, विपक्षी राजेंद्र सिंह की ओर से 23 जुलाई 2026 को दाखिल शपथ पत्र/आपत्ति में बहाली प्रार्थना पत्र को अवैधानिक, अनावश्यक एवं अमान्य बताते हुए उसे खारिज करने की मांग की गई है।

आपत्ति में यह भी कहा गया है कि बहाली प्रार्थना पत्र के साथ विलंब माफी का कोई प्रार्थना पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया है और कथित विलंब के संबंध में पर्याप्त आधार भी नहीं दिया गया है। विपक्षी पक्ष ने अपने बयान में बहाली प्रार्थना पत्र में दर्ज विभिन्न तथ्यों पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि पत्रावली के निरीक्षण से स्पष्ट हुआ कि मूल वाद 6 अप्रैल 2023 को ही पक्षकारों की अनुपस्थिति में खारिज किया जा चुका था।

विपक्षी पक्ष का आरोप है कि बहाली की मांग में आवश्यक तथ्यों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया है। मामले में दाखिल दस्तावेजों से स्पष्ट है कि वर्ष 1994 में शुरू हुआ विवाद वर्ष 2026 में भी न्यायिक प्रक्रिया में बना हुआ है।

अब बहाली प्रार्थना पत्र पर अदालत का रुख महत्वपूर्ण होगा। अदालत दोनों पक्षों की दलीलों और अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद यह तय करेगी कि बहाली प्रार्थना पत्र स्वीकार किया जाता है अथवा विपक्षी की आपत्ति के आधार पर उसे खारिज किया जाता है।

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