नई दिल्ली।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं तेज हैं। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि इस्तीफे से पहले 72 घंटों के भीतर कई महत्वपूर्ण बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं के बाद यह फैसला लिया गया। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
बताया जा रहा है कि 22 जुलाई की रात तक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की कोई योजना नहीं थी और उन्हें शीर्ष नेतृत्व का समर्थन प्राप्त था। लेकिन इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के बीच एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमें देशभर में चल रहे छात्र आंदोलन और उसके संभावित राजनीतिक प्रभाव पर चर्चा की गई।
सूत्रों के अनुसार, बैठक में यह सुझाव दिया गया कि सरकार को युवाओं के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए और स्थिति पर लगातार नजर रखनी चाहिए। साथ ही आंदोलन की दिशा और जनसमर्थन का आकलन करने के बाद आगे की रणनीति तय करने पर भी चर्चा हुई।
दावों के मुताबिक, इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से युवाओं को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से संदेश जारी करने की रणनीति भी बनाई गई, ताकि परीक्षा और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर सरकार का पक्ष सीधे छात्रों तक पहुंच सके।
सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि आंदोलन के प्रभाव को कम करने, विभिन्न छात्र संगठनों से संवाद बढ़ाने और राजनीतिक स्थिति का आकलन करने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए गए। इसके बावजूद आंदोलन की तीव्रता कम नहीं हुई और अंततः शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
इन दावों में यह भी कहा गया है कि अंतिम निर्णय की जानकारी बेहद सीमित लोगों तक ही रखी गई थी और अधिकांश नेताओं को इसकी सूचना बाद में मिली।
हालांकि, सरकार, भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए इन्हें फिलहाल सूत्रों पर आधारित दावे माना जाना चाहिए।
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