“कड़ाके की ठंड जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकियों के खिलाफ शीतकालीन अभियान तेज”

नई दिल्ली/जम्मू. जब कश्मीर की वादियां बर्फ की मोटी चादर में ढक जाती हैं, तापमान शून्य से नीचे चला जाता है और सामान्य जनजीवन ठहर सा जाता है, ठीक उसी वक्त भारतीय सेना के कदम और तेज हो जाते हैं. कड़ाके की ठंड, घना कोहरा और दुर्गम पहाड़ी इलाकों के बीच भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ और डोडा जिलों में आतंकियों के खिलाफ अपने शीतकालीन अभियानों को और अधिक धार दे दी है. सेना ने इस बार सर्दियों को ‘ऑपरेशनल ब्रेक’ नहीं, बल्कि ‘ऑपरेशनल अवसर’ के रूप में लिया है और पाकिस्तानी आतंकियों की रणनीति को उन्हीं की भाषा में जवाब देने की ठान ली है.

सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सेना ने इस सर्दी में ‘प्रोएक्टिव विंटर पोस्टर’ अपनाया है. इसका मतलब यह है कि अब बर्फबारी और दुर्गम हालात के बावजूद सेना पीछे नहीं हटेगी, बल्कि आतंकियों के संभावित ठिकानों के बेहद करीब जाकर दबाव बनाए रखेगी. इसके तहत ऊंचाई वाले इलाकों में अस्थायी बेस कैंप, फॉरवर्ड सर्विलांस पोस्ट और मोबाइल पेट्रोलिंग यूनिट्स स्थापित की गई हैं. ये वे इलाके हैं, जहां अब तक आतंकवादी सर्दियों के दौरान छिपकर रहने को सबसे सुरक्षित मानते थे.

परंपरागत रूप से कश्मीर घाटी में 21 दिसंबर से 31 जनवरी तक चलने वाला ‘चिल्लई कलां’ का दौर आतंकवादियों के लिए राहत की सांस लेकर आता रहा है. भारी बर्फबारी के कारण संपर्क मार्ग बंद हो जाते हैं, जंगलों और पहाड़ों में आवाजाही मुश्किल हो जाती है और इसी का फायदा उठाकर आतंकी अपने ठिकानों में छिप जाते थे. इस दौरान आतंकी गतिविधियों में अक्सर अस्थायी गिरावट देखी जाती थी. लेकिन इस बार सेना ने इस ‘लुल पीरियड’ की अवधारणा को ही चुनौती दे दी है.

सूत्रों का कहना है कि हालिया खुफिया इनपुट्स में संकेत मिले हैं कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन सर्दियों का फायदा उठाकर किश्तवाड़ और डोडा जैसे इलाकों में अपने नेटवर्क को फिर से सक्रिय करने की कोशिश कर रहे हैं. बर्फीले मौसम को ढाल बनाकर ये आतंकी जंगलों और पहाड़ी गुफाओं में छिपते हैं और जैसे ही हालात अनुकूल होते हैं, हमलों की साजिश रचते हैं. सेना अब इस रणनीति को जड़ से खत्म करने के लिए उन्हीं इलाकों में डेरा डाले हुए है, जहां आतंकियों की मौजूदगी की आशंका है.

जम्मू-कश्मीर के इन इलाकों की भौगोलिक स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है. घने जंगल, गहरी खाइयां, संकरे पहाड़ी रास्ते और अचानक बदलता मौसम किसी भी सैन्य अभियान को जोखिम भरा बना देता है. इसके बावजूद सेना के जवान अत्याधुनिक शीतकालीन उपकरणों, विशेष कपड़ों, ड्रोन और नाइट-विजन तकनीक के साथ लगातार गश्त कर रहे हैं. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी गई है ताकि आतंकियों की किसी भी संदिग्ध गतिविधि को शुरुआती स्तर पर ही नाकाम किया जा सके.

जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है. ठंड और कोहरे के बीच तैनात जवान चौबीसों घंटे चौकसी बरत रहे हैं, क्योंकि यह मार्ग न केवल सामरिक दृष्टि से अहम है, बल्कि आम नागरिकों की आवाजाही के लिए भी जीवनरेखा माना जाता है. सेना और सुरक्षा बल यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि आतंकी किसी भी तरह से इस मार्ग या आसपास के इलाकों को निशाना न बना सकें.

सेना के इस बदले हुए रवैये को आतंकवाद के खिलाफ एक निर्णायक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. संदेश साफ है—अब मौसम आतंकियों का सहयोगी नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगा. सेना का मानना है कि जब आतंकी यह समझ लेंगे कि सर्दियों में भी उन्हें सुरक्षित पनाह नहीं मिलेगी, तो उनके मनोबल पर गहरा असर पड़ेगा. इससे न केवल घुसपैठ की कोशिशें कमजोर होंगी, बल्कि स्थानीय नेटवर्क को भी तोड़ने में मदद मिलेगी.

इस पूरे अभियान में स्थानीय खुफिया तंत्र और तकनीकी निगरानी की भूमिका भी अहम मानी जा रही है. ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए बर्फ से ढके इलाकों में भी संदिग्ध हलचलों पर नजर रखी जा रही है. साथ ही, जमीनी स्तर पर सुरक्षा बल स्थानीय लोगों के संपर्क में रहकर सूचनाएं जुटा रहे हैं. सेना का जोर इस बात पर है कि किसी भी आतंकी को सर्दियों की आड़ में दोबारा संगठित होने का मौका न मिले. विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है. अब तक आतंकियों के लिए सर्दियां ‘रीग्रुपिंग पीरियड’ मानी जाती थीं, लेकिन यदि सेना इस दौरान भी लगातार दबाव बनाए रखती है, तो आतंकियों के लिए सुरक्षित ठिकाने ढूंढना बेहद मुश्किल हो जाएगा.

इससे आने वाले महीनों में आतंकी घटनाओं में कमी आने की संभावना जताई जा रही है. कुल मिलाकर, कश्मीर की बर्फीली रातों में भारतीय सेना की मौजूदगी यह संदेश दे रही है कि देश की सुरक्षा के लिए मौसम कोई बाधा नहीं है. कड़ाके की ठंड, बर्फीले तूफान और दुर्गम पहाड़ भी उन जवानों के हौसले को नहीं रोक सकते, जो आतंकवाद के खिलाफ मोर्चे पर डटे हैं. चिल्लई कलां की सर्दी इस बार आतंकियों के लिए राहत नहीं, बल्कि डर और असुरक्षा का दौर बनती नजर आ रही है. भारतीय सेना का यह शीतकालीन अभियान न केवल मौजूदा खतरे को निष्क्रिय करने की कोशिश है, बल्कि भविष्य में आतंकवाद की जड़ों को कमजोर करने की एक ठोस रणनीति के रूप में उभर रहा है.

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