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शानी ने कथा लेखन में राष्ट्रीय फलक पर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई : कैलाश बनवासी

– शानी के जन्मदिवस पर जलेसं का भव्य कार्यक्रम : पोस्टर प्रदर्शनी, कथा-उपन्यास विमर्श और काव्य पाठ से सजा साहित्यिक माहौल, दो किताबों का विमोचन भी

रायपुर। जनवादी लेखक संघ (जलेस) छत्तीसगढ़ और शानी फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में प्रसिद्ध साहित्यकार जनाब गुलशेर खां ‘शानी’ के जन्मदिवस पर रायपुर में भव्य साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में पोस्टर प्रदर्शनी, छत्तीसगढ़ के कथा और उपन्यास साहित्य पर विमर्श, काव्यपाठ तथा दो पुस्तकों का विमोचन किया गया। प्रदेश भर से आए साहित्यकारों और रचनाकारों ने आयोजन में भाग लिया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रसिद्ध कथाकार कैलाश बनवासी ने कहा कि शानी ने कथा लेखन में राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि राजेंद्र यादव, असगर वजाहत और अन्य प्रमुख साहित्यकारों के साथ शानी की तस्वीरें साहित्यिक इतिहास को जीवंत करती हैं। उन्होंने बताया कि 1954-55 के दौर में गजानन माधव मुक्तिबोध राजनांदगांव में रहकर रचनाकर्म कर रहे थे, जिसका प्रभाव श्रीकांत वर्मा, शानी, प्रभात त्रिपाठी और विनोद कुमार शुक्ल जैसे लेखकों पर पड़ा। कार्यक्रम का उद्घाटन वरिष्ठ कथाकार और जलेस प्रदेश अध्यक्ष कामेश्वर पांडे ने किया। उन्होंने कहा कि जब बस्तर देश के दूरस्थ और विषम क्षेत्रों में गिना जाता था, तब शानी वहां के आदिवासी और मुस्लिम समाज के संघर्षों को अपनी रचनाओं में संवेदनशीलता से चित्रित कर रहे थे। उन्होंने शानी की चर्चित कृतियों ‘कस्तूरी’ और ‘कालाजल’ का उल्लेख करते हुए हिंदी गद्य की छत्तीसगढ़ी परंपरा, हबीब तनवीर और मुक्तिबोध के साहित्य पर भी विस्तार से चर्चा की। जलेस प्रदेश सचिव पी.सी. रथ ने शानी के साहित्यिक योगदान को याद करते हुए छत्तीसगढ़ की समृद्ध लेखन परंपरा पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्यपाठ आयोजित हुआ, जिसमें नंदकुमार कंसारी, निकष परमार, राजकुमार सोनी, देवेंद्र गोस्वामी, भागीरथ प्रसाद वर्मा, पी.सी. रथ और मुमताज ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं। संचालन भास्कर चौधरी ने किया। इस अवसर पर कांकेर के वरिष्ठ कवि इस्माईल जगदलपुरी के काव्य संग्रह “बंद गली की टूटती सांसों की आखिरी ग़ज़लें” तथा कामेश्वर पांडे के लघु उपन्यास “लीलागर” का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में पारित प्रस्ताव के माध्यम से मजदूरों के न्यूनतम वेतन और 8 घंटे काम के अधिकार के आंदोलनों पर सरकारी दमन की निंदा की गई तथा लखनऊ के पत्रकार सत्यम वर्मा की रिहाई की मांग उठाई गई।

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