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महंगा किराया बना चुनावी मुद्दा, यूरोप में बदली वामपंथ की रणनीति; बर्लिन में मिली बड़ी सफलता

नई दिल्ली। बढ़ती महंगाई, महंगे मकान और लगातार बढ़ते किराए ने यूरोप की राजनीति का एजेंडा बदलना शुरू कर दिया है। अब वामपंथी दल पारंपरिक मुद्दों के साथ आम लोगों की रोजमर्रा की आर्थिक परेशानियों को चुनावी अभियान के केंद्र में ला रहे हैं। सस्ता घर, कम किराया और जीवन-यापन की बढ़ती लागत जैसे मुद्दे कई यूरोपीय शहरों में राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं।

इस बदलाव का सबसे प्रमुख उदाहरण जर्मनी की राजधानी बर्लिन में देखने को मिला। यहां वामपंथी पार्टी डाई लिंके ने आवास संकट को अपने अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाया और चुनाव में करीब 25 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। पार्टी की प्रमुख उम्मीदवार एलिफ एराल्प ने निजी कंपनियों के नियंत्रण वाले हजारों मकानों को सार्वजनिक नियंत्रण में लाने और किराए को अधिक किफायती बनाने की मांग की।

बर्लिन में आवास संकट बना चुनावी हथियार

बर्लिन में लंबे समय से मकानों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर लोगों में असंतोष है। इसी को देखते हुए डाई लिंके ने अपने प्रचार अभियान में आवास को सबसे प्रमुख मुद्दों में रखा।

एलिफ एराल्प ने बड़े रियल एस्टेट समूहों के पास मौजूद करीब 2.2 लाख मकानों को सार्वजनिक नियंत्रण में लाने की योजना का समर्थन किया। पार्टी ने किराया नियंत्रण और सामाजिक आवास बढ़ाने पर भी जोर दिया। चुनाव परिणाम में पार्टी को करीब 25.3 प्रतिशत वोट मिले और वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई।

ब्रिटेन में महंगाई और घर के खर्च को जोड़ा पर्यावरण से

ब्रिटेन में ग्रीन पार्टी के नेता जैक पोलांस्की भी महंगाई, बढ़ते किराए और महंगे मकानों को अपनी राजनीति का हिस्सा बना रहे हैं। उनकी रणनीति में पर्यावरण के मुद्दों के साथ आम परिवारों के खर्च और आर्थिक दबाव को जोड़ा गया है।

पोलांस्की सोशल मीडिया के जरिए सीधे मतदाताओं तक पहुंचने पर भी जोर देते हैं। उनकी राजनीति में अमीरों पर अधिक टैक्स, सस्ता आवास और रोजमर्रा की लागत जैसे मुद्दे प्रमुख हैं।

स्पेन में किराए और मकान का संकट बना राष्ट्रीय मुद्दा

स्पेन में भी आवास संकट को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ा है। महंगे मकान और बढ़ते किराए के कारण बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हैं। बुजुर्गों को घर से निकाले जाने जैसी घटनाओं ने इस समस्या को और गंभीर राजनीतिक मुद्दा बना दिया है।

अब वहां आवास को सिर्फ सामाजिक समस्या के रूप में नहीं बल्कि चुनावी राजनीति के महत्वपूर्ण मुद्दे के तौर पर देखा जा रहा है। सरकार पर सस्ते घर उपलब्ध कराने और किराए को नियंत्रित करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

पेरिस में सस्ते मकानों पर जोर

फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी आवास की बढ़ती कीमतों और किराए को लेकर राजनीति तेज हुई है। समाजवादी नेता इमैनुएल ग्रेगोयर सस्ते घरों की संख्या बढ़ाने, खाली मकानों को उपयोग में लाने और किराए पर नियंत्रण जैसे उपायों पर जोर दे रहे हैं।

न्यूयॉर्क और पेरिस के नेताओं के बीच हाल की बातचीत में भी किफायती आवास और किराया नियंत्रण प्रमुख विषय रहे। दोनों शहरों में आवास संकट से निपटने के लिए सार्वजनिक आवास और किराया नियंत्रण जैसे उपायों पर चर्चा हुई।

नीदरलैंड में भी आवास संकट चुनावी मुद्दा

नीदरलैंड में भी मकानों की कमी और बढ़ते किराए ने चुनावी राजनीति को प्रभावित किया है। वहां राजनीतिक दलों ने बड़ी संख्या में नए मकान बनाने की योजनाओं को अपने चुनावी एजेंडे में शामिल किया।

D66 ने हर साल बड़ी संख्या में नए घर बनाने और नई टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव रखा। इससे साफ है कि यूरोप के कई देशों में मतदाताओं की आर्थिक चिंता अब सीधे आवास नीति से जुड़ रही है।

यूरोप की राजनीति में उभर रहा नया चुनावी फॉर्मूला

यूरोप के अलग-अलग देशों के उदाहरण बताते हैं कि आवास संकट, महंगाई और जीवन-यापन की लागत अब केवल आर्थिक मुद्दे नहीं रह गए हैं। ये सीधे चुनावी बहस का हिस्सा बन रहे हैं।

बर्लिन का चुनाव इस बदलाव का अहम उदाहरण है। डाई लिंके ने आवास और किराए को अभियान के केंद्र में रखकर बड़ी संख्या में वोट हासिल किए। विश्लेषणों में उसके अभियान की तुलना न्यूयॉर्क में अपनाई गई सस्ती आवास और जीवन-यापन की राजनीति से भी की गई है।

हालांकि यूरोप के हर देश में राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि एक ही मॉडल पूरे महाद्वीप में समान परिणाम देगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि सस्ता घर, कम किराया और महंगाई से राहत यूरोपीय राजनीति में तेजी से महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे बन रहे हैं।

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