उत्तरप्रदेश: वंदे मातरम् के पूरे संस्करण के गायन को लेकर सियासी विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। दिल्ली में यह मुद्दा अब केवल ऐतिहासिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का बड़ा केंद्र बन गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के पुराने रुख पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि 1937 में पार्टी ने राजनीतिक दबाव में राष्ट्रगीत के केवल शुरुआती हिस्से को स्वीकार किया था। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार ने इस ऐतिहासिक मुद्दे को सुधारने की दिशा में कदम उठाया है और वंदे मातरम् के पूरे स्वरूप को सम्मान देने की बात दोहराई है।
अमित शाह के इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है, जहां भाजपा इसे राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक एकता से जोड़कर देख रही है। उनका कहना है कि वंदे मातरम् का पूरा पाठ देश की स्वतंत्रता संग्राम की भावना और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है, जिसे सीमित करना उचित नहीं था।
वहीं, कांग्रेस का कहना है कि 1937 के प्रस्ताव के अनुसार शुरुआती दो पदों को ही गाने का निर्णय लिया गया था और इसके पीछे सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान करने का उद्देश्य था। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि उस समय देश की सामाजिक और धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया था, ताकि किसी भी वर्ग की भावनाएं आहत न हों।
इस मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगातार बढ़ रहे हैं और दोनों दल एक-दूसरे पर इतिहास को अपने राजनीतिक नजरिए से पेश करने का आरोप लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में और भी तेज हो सकता है, क्योंकि यह मुद्दा भावनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर जनता को प्रभावित करता है।
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