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मनोवैज्ञानिक एवं पशु अधिकार कार्यकर्ता

*लेखिका: विनिता धवन*

तेलंगाना में लगभग 500 आवारा कुत्तों को ज़हरीले इंजेक्शन देकर मार दिया जाना केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर नैतिक पतन है। यह दिखाता है कि किस प्रकार राजनीतिक सुविधा, बहुत आसानी से अंतरात्मा पर भारी पड़ सकती है। आवारा कुत्ते अचानक हमारी सड़कों पर नहीं आए। वे दशकों से चली आ रही नागरिक लापरवाही का परिणाम हैं—खराब कचरा प्रबंधन, अपर्याप्त नसबंदी कार्यक्रम, जवाबदेही की कमी और नीतिगत जड़ता। मानव-निर्मित विफलताओं की सज़ा बेज़ुबान जानवरों को देना न केवल अन्यायपूर्ण बल्कि अमानवीय भी है। फिर भी, व्यवस्थागत खामियों को सुधारने के बजाय, सामूहिक हत्या को “कार्रवाई” के नाम पर चुना गया—जो स्पष्ट रूप से चुनावी दबावों से प्रेरित प्रतीत होता है।

इस घटना को और अधिक चिंताजनक बनाता है वह व्यापक वातावरण, जिसमें यह घटित हुई। सर्वोच्च न्यायिक मंचों से की गई हालिया टिप्पणियाँ और अवलोकन, भले ही सार्वजनिक सुरक्षा के उद्देश्य से हों, परंतु ज़मीनी स्तर पर उन्हें आवारा जानवरों के विरुद्ध हिंसा को नैतिक और कानूनी स्वीकृति के रूप में समझा गया है। एक मनोवैज्ञानिक के रूप में मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहती हूँ कि जब संस्थागत स्तर पर क्रूरता को सामान्य बना दिया जाता है, तो यह समाज में आपराधिक मानसिकता को जन्म देता है। ऐसी सोच भविष्य में आक्रामक, असामाजिक और हिंसक व्यवहार के विकास का कारण बन सकती है। यह मानसिकता केवल जानवरों तक सीमित नहीं रहती। यह घरेलू हिंसा, भीड़ द्वारा हिंसा, घृणा अपराधों आदि में परिवर्तित हो जाती है। जिस समाज को पीड़ा को नज़रअंदाज़ करना सिखाया जाता है, वह अंततः बिना हिचक और बिना पश्चाताप के पीड़ा पहुँचाना भी सीख लेता है।

भारत ने सदैव करुणा को एक मूल मूल्य के रूप में प्रस्तुत किया है। अहिंसा से लेकर सह-अस्तित्व तक, पशु हमारी सार्वजनिक जगहों, हमारी कथाओं और हमारी नैतिक चेतना का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में बिना पुनर्वास, बिना मानवीय विकल्पों और बिना जवाबदेही के संवेदनशील प्राणियों को ज़हर देकर मारना एक राष्ट्रीय शर्म है। यह न केवल पशु संरक्षण कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि सभी जीवों के प्रति करुणा दिखाने के हमारे संवैधानिक कर्तव्य के भी विरुद्ध है। सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वैज्ञानिक और मानवीय उपाय—जैसे सामूहिक नसबंदी, टीकाकरण, वैज्ञानिक जनसंख्या नियंत्रण और जिम्मेदार कचरा प्रबंधन—भारत के कई शहरों और विश्व के अनेक देशों में सफलतापूर्वक लागू किए जा चुके हैं।

यह समय केवल आक्रोश व्यक्त करने का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई का है।

सरकार को मानवीय नीतियों से विमुख होने और संवैधानिक मूल्यों पर चुनावी लाभ को प्राथमिकता देने के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। स्पष्ट राष्ट्रीय दिशानिर्देश लागू किए जाएँ, वैज्ञानिक पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रमों के लिए बजट आवंटित किया जाए, और तेलंगाना में हुई सामूहिक हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध सख़्त कार्रवाई की जाए। साथ ही, न्यायपालिका को भी यह समझना होगा कि उसके शब्दों का प्रभाव अदालत कक्षों से कहीं आगे तक जाता है। न्यायिक स्पष्टता अत्यंत आवश्यक है—पशुओं के विरुद्ध हिंसा की स्पष्ट और असंदिग्ध निंदा, मौजूदा पशु संरक्षण कानूनों की पुनः पुष्टि, और राज्यों को यह स्पष्ट निर्देश कि सार्वजनिक सुरक्षा के नाम पर क्रूरता को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। तेलंगाना की यह घटना केवल आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है। यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक परीक्षा है। यदि करुणा की रक्षा राज्य और न्यायालय नहीं करेंगे, तो कोई कानून, कोई फैसला और कोई चुनाव हमारे नैतिक भविष्य की रक्षा नहीं कर पाएगा।

*जय हिंद*

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