रायबरेली जिला महिला अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्था और पैथोलॉजी लैब की कार्यशैली पर एक बार फिर बड़ा प्रशासनिक और नैतिक सवाल खड़ा हो गया है। जगतपुर सीएचसी (CHC) से रेफर होकर जिला महिला अस्पताल पहुंची एक गर्भवती महिला की हेपेटाइटिस-बी जांच रिपोर्ट को लेकर जो लापरवाही सामने आई है, उसने पूरे स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा दिया है।
CHC की रिपोर्ट में पहले से थी पॉजिटिव, फिर जिला अस्पताल में कैसे हुई ‘नेगेटिव’?
मिली जानकारी के अनुसार, प्रसव के लिए लाई गई प्रसूता शहरे जहां (पत्नी मोहम्मद चांद) जगतपुर सीएचसी की शुरुआती जांच में पहले से ही हेपेटाइटिस-बी पॉजिटिव दर्ज थीं। सीएचसी से रेफरल कागजात और पुरानी रिपोर्ट के स्पष्ट होने के बावजूद, जब जिला महिला अस्पताल की लैब में जांच कराई गई, तो रिपोर्ट को ‘नेगेटिव’ बता दिया गया।
सवाल यह उठता है कि जब मरीज का इतिहास पहले से ही पॉजिटिव का इशारा कर रहा था, तब पैथोलॉजिस्ट डॉ. सुजाता त्रिपाठी की देखरेख में चल रही लैब से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? क्या सैंपल की जांच में खानापूरी की गई या टेस्ट किट की गुणवत्ता से समझौता किया गया था?
मामला तब और गंभीर हो गया जब चंद घंटों बाद, शाम लगभग 6:40 pm बजे मरीज की दोबारा जांच की गई और रिपोर्ट पॉजिटिव आई।
महिला अस्पताल में यह ‘खेल’ क्या दर्शाता है?
एक ही मरीज की कुछ घंटों के भीतर दो विपरीत रिपोर्ट आना जिला महिला अस्पताल की पैथोलॉजी व्यवस्था में चल रही घोर लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को उजागर करता है।
मरीज और नवजात की जिंदगी से खिलवाड़: हेपेटाइटिस-बी एक गंभीर संक्रामक बीमारी है। अगर पहली ‘नेगेटिव’ रिपोर्ट के भरोसे सामान्य डिलीवरी करा दी जाती, तो प्रसूता के अत्यधिक रक्तस्राव और सुरक्षा उपायों की कमी के कारण नवजात शिशु को सीधा संक्रमण होने का खतरा था।
स्टाफ की सुरक्षा पर खतरा: डिलीवरी के दौरान बिना सुरक्षात्मक तैयारी के काम करने से ऑन-ड्यूटी नर्सों, डॉक्टरों और वार्ड स्टाफ में नीडल-स्टिक या ब्लड कांटेक्ट से वायरस फैलने का जोखिम बेहद बढ़ जाता है।
जांच किटों और सैंपलिंग पर संशय: यह घटना दर्शाती है कि या तो अस्पताल में घटिया किस्म की रैपिड किट का इस्तेमाल हो रहा है या फिर पैथोलॉजी स्टाफ बिना जांच किए ही मनमाने ढंग से रिपोर्ट तैयार कर रहा है।
आखिर इस लापरवाही का ज़िम्मेदार कौन?
मरीज के परिजनों और स्थानीय लोगों में इस घटना को लेकर भारी रोष है। लोगों का सीधा सवाल है कि जब पैथोलॉजिस्ट के पद पर विशेषज्ञ डॉक्टर सुजाता त्रिपाठी हैं, तो उनके हस्ताक्षर और देखरेख में जारी होने वाली रिपोर्ट में इतना बड़ा अंतर कैसे आ सकता है? क्या इस तरह के मामलों में केवल लीपापोती होगी ,
इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, पैथोलॉजी लैब के वर्किंग प्रोटोकॉल की समीक्षा हो और दोषियों के खिलाफ कड़ा प्रशासनिक कदम उठाया जाए।

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