– ऑनलाइन पढ़ाई, गेमिंग व सोशल मीडिया ने बढ़ाई चिंता
– नेत्र विशेषज्ञ बोले- समय रहते नहीं संभले तो बच्चों की आंखों पर पड़ेगा स्थायी असर
-मोबाइल पर गेम खेलते बच्चे।
फतेहपुर। मोबाइल फोन अब केवल बातचीत का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि बच्चों की दिनचर्या का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई से लेकर ऑनलाइन गेम, सोशल मीडिया, वीडियो और मनोरंजन तक हर काम मोबाइल पर सिमट गया है। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों की आंखों पर पड़ रहा है। जिले के नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि घंटों तक मोबाइल स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखने से आंखों की पुतलियों और दृष्टि क्षमता पर सीधा असर पड़ रहा है। यही वजह है कि पहले जहां कम उम्र में चश्मा लगना अपवाद माना जाता था, वहीं अब छोटी कक्षाओं के बच्चों तक को चश्मा पहनना पड़ रहा है।
जिला अस्पताल के नेत्र चिकित्सक डॉ. आदर्श का कहना है कि डिजिटल स्क्रीन से निकलने वाली तेज रोशनी और लगातार बिना रुके स्क्रीन देखने की आदत आंखों की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव डालती है। इससे आंखों में सूखापन, जलन, सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना और फोकस करने की क्षमता प्रभावित होती है। यदि यह आदत लंबे समय तक बनी रहती है तो बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) तेजी से बढ़ सकता है और चश्मे का नंबर लगातार बढ़ने लगता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना काल के बाद ऑनलाइन पढ़ाई और स्मार्टफोन का उपयोग तेजी से बढ़ा है। अब पढ़ाई के साथ-साथ गेमिंग और सोशल मीडिया ने भी बच्चों का स्क्रीन टाइम कई गुना बढ़ा दिया है। घंटों मोबाइल पर समय बिताने के कारण बच्चों की आंखों को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता, जिससे उनकी दृष्टि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। डॉ. आदर्श ने अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर रखना संभव नहीं है, लेकिन उसके उपयोग की समय-सीमा तय करना बेहद जरूरी है। बच्चों को रोजाना कुछ समय खुले मैदान में खेलने, प्राकृतिक रोशनी में रहने और बीच-बीच में आंखों को आराम देने की आदत डालनी चाहिए। उन्होंने 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि हर 20 मिनट तक स्क्रीन देखने के बाद कम से कम 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखना चाहिए। इससे आंखों की मांसपेशियों को आराम मिलता है और डिजिटल आई स्ट्रेन का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
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इन लक्षणों को न करें नजरंदाज
आंखों में जलन और सूखापन, बार-बार सिरदर्द होना, धुंधला दिखाई देना, आंखों से पानी आना, पढ़ाई के दौरान आंखों का जल्दी थक जाना, कम उम्र में चश्मे का नंबर बढ़ना।
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ
जिला अस्पताल के नेत्र चिकित्सक डॉ. आदर्श ने कहा कि मोबाइल आज की जरूरत जरूर है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग उससे भी ज्यादा जरूरी है। अभिभावक बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखें, 20-20-20 नियम अपनाएं और नियमित रूप से आंखों की जांच कराएं। समय रहते सावधानी बरतने से कम उम्र में चश्मा लगने और आंखों की गंभीर समस्याओं से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है।
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