स्पेसएक्स के स्टारशिप रॉकेट ने अपने 14वें टेस्ट में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। 28 सितंबर को भारतीय समयानुसार शाम करीब 6:16 बजे लॉन्च किया गया स्टारशिप पहली बार पृथ्वी की कक्षा (ऑर्बिट) में पहुंचा। इस मिशन के दौरान 26 नए स्टारलिंक V3 सैटेलाइट्स भी अंतरिक्ष में तैनात किए गए।
यह मिशन स्टारशिप के लिए इसलिए अहम है क्योंकि इससे पहले की टेस्ट उड़ानों में इसे सब-ऑर्बिटल ट्रैजेक्टरी तक ही भेजा गया था। इस बार रॉकेट को ऑर्बिटल मिशन के लिए भेजा गया है, जिसमें वह पृथ्वी की करीब 275 किलोमीटर ऊंची कक्षा में लगभग 10 घंटे रहेगा और करीब 6 चक्कर लगाएगा।
मिशन पूरा होने के बाद स्टारशिप के प्रशांत महासागर में चिली के पास पानी में स्प्लैशडाउन करने की योजना है।
26 स्टारलिंक V3 सैटेलाइट किए तैनात
इस मिशन की एक और बड़ी उपलब्धि 26 स्टारलिंक V3 सैटेलाइट्स की तैनाती है। ये सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने के लिए डिजाइन किए गए हैं। इनमें से प्रत्येक सैटेलाइट करीब 1 टेराबिट प्रति सेकंड तक डेटा क्षमता जोड़ने में सक्षम बताया गया है।
सैटेलाइट अलग होने के बाद अपने सोलर पैनल और एंटीना खोलेंगे। इसके बाद छोटे इंजन और अन्य प्रणालियों की मदद से इन्हें निर्धारित कक्षा में पहुंचाया जाएगा।
मिशन में शामिल कुछ सैटेलाइट्स पर विशेष कैमरे भी लगाए गए हैं। इनका इस्तेमाल स्टारशिप की हीटशील्ड और अंतरिक्ष से वापस लौटने के दौरान उसकी स्थिति की निगरानी के लिए किया जाएगा।
403 फीट ऊंचा है स्टारशिप
स्टारशिप स्पेसक्राफ्ट और सुपर हैवी बूस्टर को मिलाकर बने इस व्हीकल की ऊंचाई करीब 403 फीट है। लॉन्च के लगभग ढाई मिनट बाद सुपर हैवी बूस्टर अलग हुआ। इसके बाद बूस्टर की समुद्र में लैंडिंग कराई गई, जबकि स्टारशिप अपने मिशन की ओर आगे बढ़ा।
ऑर्बिटल इंसर्शन बर्न पूरा करने के बाद स्टारशिप पहली बार पृथ्वी की कक्षा में पहुंचा। यह उपलब्धि स्पेसएक्स के लंबे टेस्ट अभियान में एक महत्वपूर्ण चरण मानी जा रही है।
ऑर्बिटल और सब-ऑर्बिटल उड़ान में क्या अंतर?
सब-ऑर्बिटल उड़ान में रॉकेट अंतरिक्ष की ऊंचाई तक पहुंच सकता है, लेकिन इतनी गति हासिल नहीं करता कि वह पृथ्वी की कक्षा में लगातार चक्कर लगाता रहे। इसके बाद वह वापस पृथ्वी की ओर लौट आता है।
वहीं ऑर्बिटल उड़ान में रॉकेट इतनी गति और सही दिशा हासिल करता है कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के साथ संतुलन बनाते हुए उसकी कक्षा में घूमता रहता है।
13 टेस्ट के बाद मिली बड़ी उपलब्धि
स्टारशिप के पहले टेस्ट से लेकर 13वीं उड़ान तक स्पेसएक्स ने लगातार इसके डिजाइन, बूस्टर रिकवरी, री-एंट्री, हीटशील्ड और सैटेलाइट तैनाती जैसी तकनीकों का परीक्षण किया। कई उड़ानों में रॉकेट के अलग-अलग हिस्सों की लैंडिंग सफल रही, जबकि कुछ मिशनों में ऊपरी चरण को नुकसान भी हुआ।
13वें टेस्ट में स्टारशिप के ऊपरी हिस्से ने हिंद महासागर में नियंत्रित वॉटर लैंडिंग की थी। इससे पहले के परीक्षणों में बूस्टर रिकवरी और स्टारशिप की री-एंट्री जैसी तकनीकों पर काम किया गया था।
14वें टेस्ट में पहली बार स्टारशिप को पृथ्वी की ऑर्बिट में भेजना और वास्तविक स्टारलिंक सैटेलाइट्स तैनात करना मिशन का प्रमुख हिस्सा है। आगे की उड़ानों में इन परीक्षणों से मिले डेटा का इस्तेमाल स्टारशिप को अधिक भरोसेमंद और पुन: इस्तेमाल योग्य बनाने के लिए किया जाएगा।
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