कानपुर। गंगा किनारे बसा कानपुर औद्योगिक पहचान के साथ-साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर बाद के क्रांतिकारी आंदोलनों तक इस शहर ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की कई महत्वपूर्ण घटनाओं को देखा।
कानपुर के मैस्कर घाट (सत्तीचौरा घाट), बीबीघर, नाना राव पार्क का बूढ़ा बरगद और डीएवी कॉलेज आज भी स्वतंत्रता आंदोलन के अलग-अलग अध्यायों की याद दिलाते हैं। इन स्थानों पर मौजूद शिलालेख और स्मारक उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की कहानी बताते हैं, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई।
सत्तीचौरा घाट पर हुआ था खूनी संघर्ष
1857 की क्रांति के दौरान 27 जून को सत्तीचौरा घाट पर अंग्रेजों और भारतीय क्रांतिकारियों के बीच संघर्ष हुआ। कानपुर में नाना साहेब की सेना के प्रभाव के बाद अंग्रेज सैनिकों, महिलाओं और बच्चों को गंगा के रास्ते इलाहाबाद भेजने की कोशिश की गई थी।
घाट पर नावों में सवार होने के दौरान हालात अचानक बिगड़ गए। गोलीबारी शुरू होने के बाद दोनों पक्षों में संघर्ष हुआ और बड़ी संख्या में लोग मारे गए। इस घटना ने 1857 के विद्रोह के इतिहास में कानपुर को महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।
आज भी मैस्कर घाट पर लगा शिलालेख इस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है।
बीबीघर के बाद शुरू हुआ अंग्रेजी दमन
सत्तीचौरा घाट की घटना के बाद बचे हुए अंग्रेज महिलाओं और बच्चों को बीबीघर में रखा गया। जुलाई 1857 में यहां हुई हत्या की घटना ने हालात और गंभीर कर दिए। इसके बाद अंग्रेजी सेना ने कानपुर पर दोबारा कब्जा किया और क्रांतिकारियों के खिलाफ व्यापक दमन अभियान चलाया।
गिरफ्तारियों, हत्याओं और फांसी का दौर शुरू हुआ। अंग्रेजों की कार्रवाई ने कानपुर में 1857 के संघर्ष को और भी भयावह बना दिया।
बूढ़े बरगद से जुड़ी है 133 क्रांतिकारियों की शहादत
फूलबाग क्षेत्र में स्थित वर्तमान नाना राव पार्क के पीछे वह स्थान बताया जाता है, जहां अंग्रेजी शासन ने बड़ी संख्या में भारतीयों को फांसी दी। इतिहास से जुड़े विवरणों में बरगद की शाखाओं पर 133 क्रांतिकारियों को फांसी दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
समय के साथ वह बूढ़ा बरगद मौजूद नहीं रहा, लेकिन उसी स्थान पर बनाया गया शहीद स्थल आज भी उस दौर की याद दिलाता है। वहां लगा शिलालेख क्रांतिकारियों की शहादत और अंग्रेजी दमन की कहानी को संजोए हुए है।
1857 के बाद भी नहीं थमा कानपुर का क्रांतिकारी तेवर
अंग्रेजों ने 1857 के बाद कानपुर पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, लेकिन शहर की राष्ट्रीय चेतना खत्म नहीं हुई। पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’ अखबार राष्ट्रीय विचारों और आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
भगत सिंह भी कानपुर आए और यहां गणेश शंकर विद्यार्थी तथा दूसरे क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे। आगे चलकर कानपुर क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े युवाओं की गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र बना।
डीएवी हॉस्टल में तैयार होती थीं क्रांतिकारी रणनीतियां
कानपुर के डीएवी कॉलेज और उसके हॉस्टल का स्वतंत्रता आंदोलन में खास महत्व रहा। शिव वर्मा सहित कई युवा क्रांतिकारी यहां से जुड़े थे। हॉस्टल के कमरों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गुप्त बैठकों और रणनीतियों का दौर चलता था।
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, काकोरी ट्रेन एक्शन से जुड़ी क्रांतिकारी गतिविधियों में भी कानपुर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफाकउल्ला खां, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, मन्मथनाथ गुप्त और शचींद्रनाथ सान्याल जैसे क्रांतिकारियों का नाम इस दौर से जुड़ता है।
डीएवी कॉलेज से शिव वर्मा, जयदेव कपूर, सुरेंद्र पांडेय और महादेव सिंह जैसे युवाओं का क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ना इस बात का प्रमाण है कि कानपुर के शिक्षण संस्थान भी राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना से अछूते नहीं थे।
घाटों से कॉलेज तक फैली स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी
कानपुर की स्वतंत्रता संग्राम की विरासत केवल 1857 की घटनाओं तक सीमित नहीं रही। सत्तीचौरा घाट और बीबीघर से लेकर बूढ़े बरगद और डीएवी कॉलेज के हॉस्टल तक शहर के अलग-अलग स्थान स्वतंत्रता संघर्ष के अलग-अलग दौर के गवाह बने।
आजादी के 79वें वर्ष में इन ऐतिहासिक स्थलों को देखना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि उन संघर्षों को समझना भी है, जिनके लंबे सिलसिले के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
कानपुर की धरती आज भी अपने घाटों, स्मारकों और शिक्षण संस्थानों के जरिए 1857 के विद्रोह से लेकर भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के दौर तक की क्रांतिकारी चेतना की कहानी सुनाती है।
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