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देश की 629 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं समय-सीमा से पीछे, राज्यसभा में नितिन गडकरी ने दी जानकारी

नई दिल्ली। देश में सड़क और राजमार्ग बुनियादी ढांचे के विस्तार के बीच निर्माणाधीन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में देरी का मामला सामने आया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को राज्यसभा में दिए एक लिखित उत्तर में बताया कि देशभर में इस समय निर्माणाधीन कुल 1,191 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में से 629 परियोजनाएं अपनी निर्धारित मूल समय-सीमा से पीछे चल रही हैं। हालांकि, केंद्रीय मंत्री ने अपने उत्तर में इन परियोजनाओं में हो रही देरी की कोई एक निश्चित या विशिष्ट वजह नहीं बताई।

सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, आधे से अधिक निर्माणाधीन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं तय कार्यक्रम के अनुसार पूरी नहीं हो सकी हैं। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद बड़े बुनियादी ढांचा कार्यों की निगरानी, निर्माण एजेंसियों की कार्यप्रणाली और परियोजनाओं को समय पर पूरा कराने की सरकारी रणनीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं देश की परिवहन व्यवस्था, व्यापार, उद्योग और आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इनके माध्यम से न केवल राज्यों और प्रमुख शहरों के बीच सड़क संपर्क बेहतर होता है, बल्कि माल ढुलाई में लगने वाला समय और परिवहन लागत भी कम होती है। ऐसे में बड़ी संख्या में परियोजनाओं का निर्धारित समय से पीछे चलना विकास योजनाओं के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।

राज्यसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, देश में फिलहाल 1,191 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं पर निर्माण कार्य चल रहा है। इनमें से 629 परियोजनाएं अपनी मूल स्वीकृत समय-सीमा के भीतर पूरी नहीं हो पाई हैं। इस हिसाब से निर्माणाधीन परियोजनाओं का एक बड़ा हिस्सा विलंबित श्रेणी में आ गया है। शेष परियोजनाओं पर निर्धारित समय के अनुसार या संशोधित कार्ययोजना के तहत काम जारी है।

केंद्रीय मंत्री के लिखित जवाब में देरी के कारणों का परियोजनावार विवरण नहीं दिया गया। सामान्य तौर पर सड़क एवं राजमार्ग परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण एवं वन संबंधी अनुमति, उपयोगिता सेवाओं को स्थानांतरित करने, निर्माण सामग्री की उपलब्धता और स्थानीय विवादों के कारण कार्य प्रभावित होता है। इसके अलावा मौसम, प्राकृतिक आपदा, ठेकेदारों की वित्तीय स्थिति और तकनीकी समस्याएं भी परियोजनाओं की गति को प्रभावित कर सकती हैं।

कई परियोजनाओं में सड़क निर्माण शुरू होने से पहले पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं हो पाती। बिजली की लाइन, पानी की पाइपलाइन, गैस पाइपलाइन और दूरसंचार केबल जैसी सेवाओं को स्थानांतरित करने में भी समय लग सकता है। पहाड़ी और वन क्षेत्रों में आवश्यक मंजूरी मिलने में देरी होने से परियोजनाओं की लागत और समय दोनों बढ़ने की आशंका रहती है।

बड़े राजमार्ग निर्माण कार्यों में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, जिला प्रशासन और संबंधित निर्माण एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक होता है। भूमि अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े मामलों में विवाद होने पर काम लंबे समय तक प्रभावित हो सकता है। इसी प्रकार किसी ठेकेदार की क्षमता या वित्तीय स्थिति कमजोर होने पर भी निर्माण गति धीमी पड़ सकती है।

परियोजनाओं में विलंब का सीधा असर उनकी लागत पर पड़ने की आशंका रहती है। निर्माण सामग्री, श्रम, मशीनरी और ईंधन की कीमतों में वृद्धि होने पर निर्धारित समय से अधिक चलने वाली परियोजनाओं का कुल खर्च बढ़ सकता है। इसके अलावा सड़क निर्माण के दौरान लंबी अवधि तक अधूरे पड़े मार्गों से स्थानीय नागरिकों और वाहन चालकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

अधूरे निर्माण कार्यों के कारण यातायात जाम, दुर्घटना की आशंका और धूल प्रदूषण जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। विशेष रूप से उन मार्गों पर स्थिति अधिक गंभीर हो जाती है, जहां पहले से चल रही सड़क को चौड़ा करने या फ्लाईओवर और पुल बनाने का काम चल रहा होता है। ऐसे स्थानों पर यातायात को अस्थायी मार्गों से संचालित करना पड़ता है।

सरकार राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की नियमित समीक्षा और निगरानी का दावा करती रही है। विभिन्न स्तरों पर प्रगति की समीक्षा करने के साथ निर्माण एजेंसियों को समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने के निर्देश दिए जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर परियोजनाओं की समय-सीमा संशोधित करने, बाधाओं को दूर करने और ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई करने जैसे कदम भी उठाए जाते हैं।

राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण से जुड़े मंत्रालय और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा परियोजनाओं की प्रगति की डिजिटल माध्यम से भी निगरानी की जाती है। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में परियोजनाओं का मूल समय-सीमा से पीछे रहना यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर निर्माण कार्यों को पूरा करने में कई प्रकार की चुनौतियां बनी हुई हैं।

विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठा सकते हैं। विपक्ष का कहना हो सकता है कि केवल नई परियोजनाओं की घोषणा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पहले से स्वीकृत और निर्माणाधीन योजनाओं को निर्धारित समय तथा लागत के भीतर पूरा कराना भी जरूरी है। वहीं सरकार का पक्ष रहता है कि सड़क परियोजनाएं बड़े पैमाने पर संचालित होती हैं और कई बार ऐसी बाधाएं सामने आती हैं, जो संबंधित निर्माण एजेंसी के नियंत्रण से बाहर होती हैं।

सड़क परिवहन विशेषज्ञों के अनुसार, परियोजना स्वीकृत करने से पहले भूमि उपलब्धता, पर्यावरणीय अनुमति और निर्माण स्थल की वास्तविक परिस्थितियों का विस्तृत अध्ययन जरूरी है। यदि निर्माण शुरू होने से पहले सभी प्रमुख बाधाओं का समाधान कर लिया जाए तो कार्य में देरी और लागत वृद्धि की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि परियोजनाओं की जिम्मेदारी तय करने के लिए पारदर्शी निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए। प्रत्येक परियोजना में देरी के कारण, संशोधित समय-सीमा और बढ़ी हुई लागत की जानकारी सार्वजनिक करने से जवाबदेही बढ़ सकती है। साथ ही बेहतर प्रदर्शन करने वाली निर्माण एजेंसियों को प्रोत्साहित और लगातार पिछड़ने वाली एजेंसियों पर कार्रवाई की व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए।

राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार केंद्र सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। नई सड़कों, एक्सप्रेसवे, पुलों और सुरंगों के माध्यम से देश के विभिन्न क्षेत्रों को बेहतर संपर्क देने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि पिछले वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क और निर्माण की गति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके बावजूद लंबित और विलंबित परियोजनाओं को समय पर पूरा करना मंत्रालय के सामने एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

फिलहाल राज्यसभा में दिए गए लिखित उत्तर से यह स्पष्ट हुआ है कि निर्माणाधीन 1,191 परियोजनाओं में से 629 अपनी मूल समय-सीमा से पीछे हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन परियोजनाओं को शीघ्र पूरा कराने, देरी के कारणों को दूर करने और बढ़ती लागत को नियंत्रित करने के लिए कौन से ठोस कदम उठाती है। समय पर परियोजनाएं पूरी होने से ही आम लोगों को बेहतर सड़क संपर्क, सुरक्षित यात्रा और तेज परिवहन का वास्तविक लाभ मिल सकेगा।

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