न्यूज वाणी ब्यूरो
लखनऊ। आरक्षण छोड़ने संबंधी मोहन भागवत के बयान को लेकर अखिल भारतीय असंगठित कामगार और कर्मचारी कांग्रेस (केकेसी) के प्रदेश कोऑर्डिनेटर मिस्बाहुल हक ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि जब तक देश में वास्तविक सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित नहीं हो जाती, तब तक आरक्षण छोड़ने जैसी अपील सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा को कमजोर करने वाली साबित हो सकती है। आरक्षण किसी सरकार, संगठन या राजनीतिक दल की कृपा अथवा उपहार नहीं, बल्कि भारतीय संविधान द्वारा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से वंचित वर्गों को बराबरी का अवसर और पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिलाने का संवैधानिक माध्यम है।
मिस्बाहुल हक ने कहा कि यदि देश में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो जाएं जहां किसी व्यक्ति की जाति, वर्ग, आर्थिक स्थिति अथवा उसके गांव-शहर में जन्म लेने से उसके अवसर प्रभावित न हों, तब आरक्षण की आवश्यकता पर अलग विमर्श हो सकता है। लेकिन इससे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि गांव से लेकर महानगर तक प्रत्येक नागरिक को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, सम्मानजनक रोजगार और आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध हों।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज देश में वास्तव में ऐसी सामाजिक समानता स्थापित हो चुकी है? क्या गरीब और वंचित परिवार के बच्चे को शिक्षा और रोजगार के वही अवसर मिल रहे हैं जो आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत परिवारों के बच्चों को उपलब्ध हैं? यदि इन सवालों का जवाब नहीं है तो आरक्षण छोड़ने की अपील करने से पहले समाज में मौजूद असमानताओं को समाप्त करने के ठोस प्रयास किए जाने चाहिए।
‘सदियों की असमानता केवल अपील से समाप्त नहीं होगी’
केकेसी प्रदेश कोऑर्डिनेटर ने कहा कि सदियों से चली आ रही सामाजिक और आर्थिक असमानता केवल किसी अपील या बयान से समाप्त नहीं हो सकती। आरक्षण असमानता पैदा करने की व्यवस्था नहीं, बल्कि पहले से मौजूद असमानता को कम करने और वंचित समाज को मुख्यधारा में सम्मानजनक भागीदारी दिलाने का संवैधानिक औजार है।
उन्होंने कहा कि जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, संपत्ति और अवसरों तक पहुंच में वास्तविक बराबरी नहीं आती, तब तक आरक्षण को कमजोर करने की बात सामाजिक न्याय के उद्देश्य को नुकसान पहुंचा सकती है।
विकास के दावों के बीच आम आदमी की आर्थिक सुरक्षा पर उठाया सवाल
मिस्बाहुल हक ने कहा कि नीति आयोग सहित विभिन्न सरकारी आंकड़ों और रिपोर्टों में गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तथा जीवन स्तर से जुड़े संकेतकों पर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में यह भी देखा जाना चाहिए कि विकास और नीतिगत स्थिरता के दावों का वास्तविक लाभ आम आदमी के जीवन में कितना दिखाई दे रहा है।
उन्होंने कहा कि आर्थिक प्रगति का वास्तविक अर्थ तभी है जब उसका लाभ गांव, खेत, मजदूर, कर्मचारी, छोटे कारोबारी, गरीब परिवारों और युवाओं तक पहुंचे। विकास का मूल्यांकन केवल बड़े आंकड़ों से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आई आर्थिक सुरक्षा, रोजगार के अवसर और जीवन स्तर में सुधार के आधार पर भी होना चाहिए।
‘अधिकार छोड़ने नहीं, उन्हें ईमानदारी से लागू करने की जरूरत’
मिस्बाहुल हक ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने वंचित वर्गों को अधिकार इसलिए दिए ताकि सामाजिक रूप से पीछे रह गए समुदाय भी देश की मुख्यधारा में सम्मान और बराबरी के साथ भागीदारी कर सकें। इसलिए आज आवश्यकता संवैधानिक अधिकारों को छोड़ने की अपील करने की नहीं, बल्कि उन्हें पूरी ईमानदारी और प्रभावी तरीके से लागू करने की है।
उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की कि आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर राजनीतिक बयानबाजी के बजाय विश्वसनीय सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों को सामने रखा जाए। साथ ही गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार सृजन और समान अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस नीतियां बनाई जाएं।
‘पहले सामाजिक समानता स्थापित हो, फिर आरक्षण पर हो बात’
मिस्बाहुल हक ने कहा, “समानता का लक्ष्य केवल आरक्षण खत्म करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जहां किसी व्यक्ति की जाति, वर्ग, गांव या आर्थिक स्थिति उसके अवसरों की सीमा तय न करे। सवाल यह है कि क्या हम सामाजिक समरसता के उस पायदान तक पहुंच गए हैं जहां वास्तविक सामाजिक समानता स्थापित हो चुकी है? यदि नहीं, तो आरक्षण छोड़ने जैसे बयान न्याय की अवधारणा को कमजोर करते हैं।”
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